सोमवार

क्या है हाई ब्लड प्रेशर? हाई ब्लड प्रेशर कितने प्रकार के होते हैं? हाई ब्लड प्रेशर के लक्षण क्या हैं? हाई ब्लड प्रेशर के कारण क्या है?

हाई ब्लड प्रेशर आज कल आम समस्या बनती जा रही है। इसे गंभीरता से न लेने के कारण ज्यादातर लोग आसानी से इसका शिकार बनते जा रहे हैं। भारत में 8 लोगों में से 1 व्यक्ति उच्च रक्तचाप का शिकार हैं। इन लोगों को अपना रक्तचाप सामान्य रखने के लिए गोलियां लेनी पड़ती है, लेकिन फिर भी वह इससे छुटकारा नहीं पा पाते हैं।

high blood pressure
High Blood Pressure

हर साल 17 मई को विश्व उच्च रक्तचाप दिवस मनाया जाता है ताकि इस बीमारी के प्रति लोग जागरूक रहें।

क्या है हाई ब्लड प्रेशर?

हाई ब्लड प्रेशर को हाइपरटेंशन भी कहते है, इसमें दिल की धमनियों में ब्लड फ्लो काफी तेज़ हो जाता है। वैसे तो यह समस्या ठीक हो जाती है, लेकिन इसका इलाज काफी समय तक न किया जाए तो यह दिल संबंधी बीमारियों का कारण बन सकता है जिसकी वजह से व्यक्ति की मौत भी हो सकती है।

हाई ब्लड प्रेशर कितने प्रकार के होते हैं?

हाई ब्लड प्रेशर के प्रकार कुछ इस प्रकार हैं:

1. प्राइमरी : यह हाई ब्लड प्रेशर का शुरुआती प्रकार होता है। यह उम्र बढ़ने के साथ-साथ होता है जिससे अधिकतर लोग इसका शिकार होते हैं।

2. सेकंडरी : किसी दूसरी बीमारी या दवा लेने से यह ब्लड प्रेशर होने की उम्मीद होती है।

हाई ब्लड प्रेशर के लक्षण क्या हैं?

हाई ब्लड प्रेशर को ‘साइलेंट किलर’ भी कहा जाता है, क्योंकि यह कई बार बिना संकेत के ही शरीर में घुस जाता है। लेकिन यहां हम कुछ हाई बीपी के लक्षण बता रहे हैं, जो इसकी शुरूआत का संकेत देते हैं।

• लगातार सिरदर्द होना- हाई ब्लड प्रेशर का प्रमुख लक्षण व्यक्ति को लगातार सिरदर्द होना है।

आमतौर पर, तनाव को सिरदर्द का कारण समझा जाता है जिसकी वजह से दवाई भी ली जाती है। लेकिन यह हाई ब्लड प्रेशर का लक्षण भी होता है।

• थकान महसूस होना- हाई ब्लड प्रेशर का अन्य लक्षण है, बार-बार थकान महसूस होना।

यदि किसी छोटा सा काम करने में भी काफी थकान महसूस हो तो इसे समस्या को नज़रअदाज़ नहीं करना चाहिए।

• सीने में दर्द होना- अगर किसी व्यक्ति के सीने में दर्द होता है, तो यह भी हाई ब्लड प्रेशर का संकेत है और इसके लिए डॉक्टर को जाकर जरूर दिखाना चाहिए।

• सांस लेने में तकलीफ होना- हाई ब्₹लड प्रेशर होने पर सांस लेने में दिक्कत होती है और सांस फूलती है। इसलिए इसका समय पर इलाज शुरू करवाना जरूरी होता हैं

• दिल की धड़कनों का अनियमति गति से चलना-

हाई ब्लड कैंसर में दिल की धड़कने अनियमित गति से चलने लगती है।

यदि किसी व्यक्ति को यह समस्या होती है तो उसे एक बार डॉक्टर जो जरूर दिखाए।

• चक्कर आना

हाई ब्लड प्रेशर में खून का प्रवास इतना जल्दी होने लगता है जिससे चक्कर आ सकते है।

• नाक से खून निकलना

ब्लड प्रेशर ज्यादा होने से नाक कि मांसपेशियों पर दवाब पड़ता है, जिसकी वजह से नाक से खून निकल सकता है।

हाई ब्लड प्रेशर होने के कई सारे कारण होते है, जो इस प्रकार है:

• धूम्रपान करना- जो लोग धूम्रपान करते हैं। उन लोगो में हाई ब्लड प्रेशर होने की संभावना ज्यादा होती है।

• वजन का अधिक होना- मोटापे को अच्छा नहीं माना जाता है क्योंकि हाई ब्लड प्रेशर वजन के अधिक होने की वजह से भी होता है।

• व्यायाम न करना- स्वस्थ रहने की लिए व्यायाम करना बहुत जरूरी होता है। यह शरीर की मांसपेशियों को मजबूत करता है और रोग-प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है। इसलिए अगर नियमित रूप से व्यायाम नहीं किया जाए तो हाई ब्लड प्रेशर होने का खतरा काफी बढ़ जाता है।

• खाने में ज्यादा नमक खाना- यदि कोई व्यक्ति खाने में ज्यादा नमक लेता है, तो उसे हाई ब्लड प्रेशर की बीमारी होने की संभावना काफी ज्यादा रहती है।

• तनाव लेना- इनमें हाई ब्लड प्रेशर उन लोगों में अधिक देखने को मिलता है, जो तनाव ज्यादा लेते हैं।

उम्र के हिसाब से कितना होना चाहिए ब्लड प्रेशर?

यह जानना बहुत जरूरी है कि उम्र के हिसाब से किस व्यक्ति का कितना ब्लड प्रेशर होना चाहिए।

15 से 18 साल
पुरुष 117 - 77 mmhg
महिला 120 - 79 mmhg

21 से 25 साल
पुरुष 121 - 79 mmhg
महिला 116 - 71 mmhg

26 से 30 साल
पुरुष 120 - 77 mmhg
महिला 114 - 72 mmhg

31से 35 साल
पुरुष 115 - 77 mmhg
महिला 110 - 73 mmhg

36 से 40 साल
पुरुष 120 - 76 mmhg
महिला 113 - 75 mmhg

41 से 45 साल
पुरुष 116 - 80 mmhg
महिलाओं 127 - 74 mmhg

46 से 50 साल
पुरुष 120 - 81 mmhg
महिला 124 - 79 mmhg

51 से 55 साल
पुरुष 126 - 80 mmhg
महिला 123 -75 mmhg

56 से 60 साल
पुरुष 130 - 80 mmhg
महिला 133 - 79 mmhg

60 से अधिक 
पुरुष 144 - 77mmhg
महिला 130 - 77 mmhg

उच्च रक्तचाप के क्या जोखिम हो सकते हैं?

किसी भी बीमारी को नज़रअदाज़ नहीं करना चाहिए क्योंकि ज्यादा समय तक इलाज न कराने पर वह गंभीर रूप ले लेती है। बहुत सारे लोग हाई ब्लड प्रेशर की ओर ध्यान नहीं देते हैं इसी कारण उन्हें निम्नलिखित जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है-

• मस्तिष्क की रक्तवाहिकाओं में ब्लॉकेज होना:

यह हाई ब्लड प्रेशर का प्रमुख जोखिम है, इसमें व्यक्ति के मस्तिष्क की रक्तवाहिकाओं में ब्लॉकेज हो जाता है। ये बहुत घातक हो सकता है, इसलिए समय रहते इलाज करवाना जरूरी है।

• ​आर्टरीज पर प्रभाव:

हाई ब्लड प्रेशर धमनियों से ब्लड फ्लो के दबाव को बढ़ाता है, जिससे धमनियों की अंदरूनी परत, कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती है। जो धीरे धीरे आर्टरीज पर प्रभाव डालती है और ये खतरनाक हो जाता है।

• हृदय पर प्रभाव

हाई ब्लड प्रेशर होने पर हार्ट को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। और ज्यादा दबाव के कारण दिल का दौरा पड़ने का खतरा बढ़ जाता है। धीरे-धीरे हृदय भी काफी कमजोर हो जाता है और हार्ट फेल होने की संभावना भी बढ़ जाती है।

• तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव:

हाई ब्लड प्रेशर तंत्रिका तंत्र को भी प्रभावित करता है। उच्च रक्तचाप के कारण मस्तिष्क में ब्लड का फ्लो कम होने लगता है जिससे याददाश्त कमजोर होने लगती है। इतना ही नहीं, हाई ब्लड प्रेशर के कारण मस्तिष्क की धमनियों को भी नुकसान होता है।

• ​​आंखों पर प्रभाव:

हाई ब्लड प्रेशर आखों पर बुरा प्रभाव डालता है। इससे आंखों में रक्त वाहिकाओं को भी नुकसान हो सकता है। अगर वह फट जाती हैं तो इससे देखने में दिक्कत होती है और आपको धुंधलापन या अंधेपन की समस्या हो सकती है।

• हड्डियों पर प्रभाव:

हाई ब्लड प्रेशर हड्डियों को भी नुकसान पहुंचता है। यह यूरिन में कैल्शियम की मात्रा को बढ़ा देता है और शरीर के बोन डेंसिटी पर प्रभाव डालता है और हड्डियां कमजोर हो जाती हैं।

• श्वसन प्रणाली पर प्रभाव:

हाई ब्लड प्रेशर से फेफड़ों में धमनियां डैमेज हो जाती हैं। तो ये बहुत ही खतरनाक हो जाती है।

• नींद पर प्रभाव:

हाई ब्लड प्रेशर के कारण नींद पर भी बुरा असर पड़ता है। इससे सोने में दिक्कत होती है।

 हाई ब्लड प्रेशर से कैसे बचें?

अगर आप अपने आहार और जीवनशैली में थोड़ा बदलाव लाएं तो आप हाई ब्लड प्रेशर पर पूरी तरह नियंत्रण पा सकें।

• स्वस्थ आहार लें - हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने के लिए ताजे फल और सब्जियां खूब खाएं।

• वजन कंट्रोल करे - अधिक वजन होने के कारण ब्लड प्रेशर बढ़ने का खतरा रहता है। इसलिए वजन कंट्रोल रखना बहुत जरूरी है।

• शारीरिक गतिविधियां करे- शारीरिक गतिविधि वजन कंट्रोल रखने और ब्लड प्रेशर को कम करने में मदद करता है। इसलिए 30 मिनट एक्सरसाइज जरूर करें।

• धूम्रपान से बचें- धूम्रपान ब्लड प्रेशर को बढ़ाता है और हार्ट अटैक और स्ट्रोक के जोखिम को बढ़ा देता है।

• शराब से दूर रहें- शराब ब्लड प्रेशर को बढ़ाती है इसलिए अधिक शराब नहीं पीनी चाहिए।

• पर्याप्त नींद लें - पर्याप्त नींद लेना बहुत महत्वपूर्ण है। ये हाई ब्लड प्रेशर को रोकती है।

हाई ब्लड प्रेशर में क्या खाएं?

• रोज 4 अखरोट एवं 5 से 7 बादाम खाएं।

• फलों में सेब, अमरूद, अनार, केला, अंगूर, अनानास, मौसंबी, पपीता खाएं।

• रोज सुबह खाली पेट लहसुन की 2 कलियां खाएं।

• खट्टे फल, नींबू पानी, सूप, नारियल पानी, सोया, अलसी और काले चने खाएं।

• पानी खूब पिएं।

• खाना बनाने के लिए सोयाबीन तेल का इस्तेमाल करे।

• सलाद में प्याज, टमाटर, मूली, गाजर, खीरा, गोभी खाएं।

• बिना मलाई वाले दूध पिए।

• अपने खाने में ओमेगा-3 भी शामिल करें।

• डार्क चॉकलेट भी खा सकते है।

हाई ब्लड प्रेशर में क्या ना खाए?

• जिस व्यक्ति का ब्लड प्रेशर हाई होता है उसे नमक कम खाना चाहिए।

• कॉफी और चाय का सेवन कम करना चाहिए।

• डिब्बा बंद खाने का सेवन करने से बचें।

• स्मोकिंग और शराब से दूर रहें।

• बाहर की चीजें जैसे पिज्जा, बर्गर आदि खाने से बचें।

• बेकिंग सोड़ा का सेवन नहीं करना चाहिए।

• भोजन में नमक ऊपर से न डालें।

• चटनी, आचार, अजीनोमोटो, बेंकिंग पाउडर और सॉस से दूर रहें।

• ज्यादा फैट वाली चीज नही खानी चाहिए।

हाई ब्लड प्रेशर की जांच कैसे की जाती है?

हाई बीपी का परीक्षण करना बहुत आसान है। यदि आपका ब्लड प्रेसर ज्यादा रहता है, तो डॉक्टर एक हफ्ते तक कई बार ब्लड प्रेशर चेक करने के लिए कहते हैं। क्योंकि एक बार के टेस्ट से हाई बीपी का पता नही चल पाता।

डॉक्टर यह जानना चाहते हैं कि समस्या लगातार बनी रहती है कि नहीं क्योंकि कई बार पर्यावरण की वजह से भी ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है।

अगर बीपी बढ़ा हुआ रहता है, तो डॉक्टर दूसरी बिमारियों का पता करने के लिए और परीक्षण कर सकते है ये परीक्षण निम्न हो सकते हैं:

• यूरिन टेस्ट

• कोलेस्ट्रॉल स्क्रीनिंग

• ईसीजी

हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने के घरेलू उपाय क्या हैं?

1. लहसुन:

लहसुन हर घर में इस्तेमाल किया जाता है। लहसुन ब्लड प्रेशर ठीक करने में बहुत मदद करता है। आप सुबह-शाम एक चम्मच शहद के साथ 1 लहसुन की कली ले सकते हैं। इसके अलावा खाने में भी लहसुन का उपयोग करे।

2. आवलें का रस:

एक बड़ा चम्मच आँवले का रस और शहद मिलाकर सुबह-शाम लेने से हाई ब्लड प्रेशर कम होता है।

3. काली मिर्च:

जब ब्लड प्रेशर बढ़ा हो तो आधे गिलास गुनगुने पानी में काली मिर्च पाउडर का एक चम्मच घोल लें। और थोड़ी थोड़ी देर में इसे पिए।

4. तरबूज:

तरबूज के बीज की गिरी और खसखस अलग-अलग पीसकर बराबर मात्रा में रख लें। इसको रोज एक-एक चम्मच लें।

5. नींबू:

बढ़े हुए ब्लड प्रेशर में एक गिलास पानी में आधा नींबू निचोड़कर तीन-तीन घण्टे के अन्तर में पीना चाहिए। इससे उच्च रक्तचाप का इलाज होता है।

6. तुलसी और नीम:

पाँच तुलसी के पत्ते तथा दो नीम की पत्तियों को पीस लें और एक गिलास पानी में घोलकर रोज खाली पेट सुबह पिएं।

7. नंगे पैर हरी घास पर चलना:

हाई ब्लड प्रेशर में नंगे पैर हरी घास पर 10-15 मिनट तक चलना चाहिए। रोजाना चलने से ब्लड प्रेशर नॉर्मल हो जाता है।

8. पालक और गाजर का जूस:

ताजा पालक और गाजर का रस रोज पिएं। इसका रस लाभकारी सिद्ध होता है।

9. करेला:

करेला और सहजन के फल का खाया करें। ये हाई ब्लड प्रेशर को ठीक करता है।

10. ब्राउन राइस:

ब्लड प्रेशर के रोगियों को ब्राउन चावल खाना चाहिए। ये बहुत लाभ देता है और ब्लड प्रेशर कंट्रोल करता है।

11. मेथीदाना:

3 ग्राम मेथीदाना पाउडर सुबह-शाम पानी के साथ लें। इससे ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रहता है।

12. टमाटर:

ब्लड प्रेशर के उपचार के लिए टमाटर खाना चाहिए। इसलिए रोजाना एक टमाटर या एक कप टमाटर का जूस पिएं।

13. अनार:

रोजाना एक अनार या अनार का जूस पीने से हाई ब्लड प्रेशर कम हो जाता है।

14. चुकंदर:

आप चुकंदर से भी बीपी कम कर सकते हैं। एक चुकंदर और आधी मूली लें। इनको छील कर इनके छोटे-छोटे टुकड़े कर के जूस निकाल लें। यह जूस दिन में एक बार पिए।

15. नारियल:

आप नारियल से भी ब्लड प्रेशर कम कर सकते हैं। आप दिन में 2-3 बार नारियल पानी पिए।

डॉक्टर के पास कब जाना चाहिए?

जब ब्लड प्रेशर 140-90 से अधिक होता है और सीने में दर्द और भारीपन महसूस हो, और सांस लेने में परेशानी हो।l, सिर दर्द हो, कमजोरी या धुंधला दिखाई दे तो मरीज को डॉक्टर के जल्द से जल्द लेकर जा a चाहिए।

पूछे गए कुछ सवाल?

Q. क्या हाई ब्लड प्रेशर के कारण नकसीर हो सकती है?

Ans. जी हां, हाई बीपी की वजह से नाक से खून बहता है।

Q. ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में कितना समय लगता है?

Ans. ब्लड प्रेशर कंट्रोल करना ब्लड प्रेशर के सिम्पटम्स और उसके उपचार पर निर्भर करता है। वैसे बीपी को नॉर्मल होने में 3 हफ्ते लग सकते हैं।

Q. हाई ब्लड प्रेशर गर्भावस्था को कैसे प्रभावित करता है?

Ans. गर्भावस्था में हाई बल्ड प्रेशर के कारण समय से पहले बच्चे का जन्म, बच्चे का विकास ठीक से न होना, हृदय रोग का खतरा और बच्चे का वजन कम होने जैसी कई समस्याएं होती हैं।

Q. क्या पानी पीने से ब्लड प्रेशर कम हो सकता है?

Ans. पानी पीना सेहत के लिए अच्छा होता है, इसलिए खुद को स्वस्थ रखने के लिए पानी की सही मात्रा लें। और ब्लड प्रेशर को कम करने के लिए सिर्फ पानी पर निर्भर न रहें।



बुधवार

वट सावित्री व्रत हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या के दिन रखा जाता है।

Vat Savitri Vrat 2021

हिंदू पंचांग के अनुसार, वट सावित्री व्रत हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या के दिन रखा जाता है। वट सावित्री व्रत जीवनसाथी की लंबी आयु और स्वस्थ जीवन के लिए किया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं, परिक्रमा करती हैं और कलावा बांधती हैं। इसी दिन शनि जयंती मनाने की भी परंपरा है लेकिन इस बार इसी दिन सूर्यग्रहण भी लग रहा है।

vat savitri vrat
vat savitri vrat

इस बार 10 जून 2021, गुरुवार को अमावस्या के दिन साल 2021 का पहला सूर्यग्रहण लगेगा। ग्रहण लगने से 12 घंटे पहले सूतक लग जाता है और पूजा-पाठ करना वर्जित माना जाता है। हालांकि भारत की बहुत ही कम जगहों पर आंशिक रूप से सूर्य ग्रहण दिखाई देगा। इसी कारण भारत में सूतक काल मान्य नहीं होगा। इसलिए विवाहित स्त्रियां वट सावित्री व्रत की पूजा विधि-विधान के साथ कर सकती हैं।

क्या है वटवृक्ष का महत्व?

वट सावित्री व्रत बहुत ही महत्‍वपूर्ण व्रत में से एक है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और शिव का वास है। मान्यताओं के अनुसार, वटवृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पति को पुन: जीवित किया था। तब से इस व्रत को ‘वट सावित्री’ के नाम से जाना जाता है। इस दिन महिलाएं सावित्री जैसा अखंड सौभाग्‍य पाने के लिए इस व्रत को पूरी श्रृद्धा और आस्‍था के साथ करती हैं। इस दिन महिलाएं श्रंगार करके वट वृक्ष और सावित्री-सत्यवान की पूजा करती हैं। वृक्ष की परिक्रमा करते हुए 108 बार कच्चा सूत लपेटती है और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। सावित्री की कथा सुनने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और पति के संकट दूर होते हैं।

वट सावित्री व्रत का शुभ मुहूर्त:

ज्येष्ठ अमावस्या तिथि आरंभ- बुधवार, 9 जून 2021, दोपहर 1 बजकर 57 मिनट से

ज्येष्ठ अमावस्या तिथि समाप्त- गुरुवार, 10 जून 2021, शाम 4 बजकर 20 मिनट पर

वट सावित्री व्रत तिथि- गुरुवार, 10 जून 2021

वट सावित्री व्रत पारण- शुक्रवार, 11 जून 2021


शुभ काल

अभिजीत मुहूर्त - सुबह, 11 बजकर 59 मिनट से दोपहर, 12 बजकर 53 मिनट तक

अमृत काल - सुबह, 8 बजकर 8 मिनट से सुबह, 9 बजकर 56 मिनट तक

ब्रह्म मुहूर्त - सुबह, 4 बजकर 8 मिनट से सुबह, 4 बजकर 56 मिनट तक


इस समय न करें पूजन

राहुकाल- दोपहर, 2 बजकर 30 मिनट से शाम, 3 बजकर 47 मिनट तक

यमगण्ड- सुबह, 5 बजकर 44 मिनट से सुबह, 7 बजकर 24 मिनट तक

आडल योग- सुबह, 4 बजकर 57 मिनट से सुबह, 11 बजकर 45 मिनट तक

दुर्मुहूर्त- सुबह, 10 बजकर 12 मिनट से सुबह, 10 बजकर 25 मिनट तक

कुलिक काल- सुबह, 9 बजकर 5 मिनट से सुबह, 10 बजकर 45 मिनट तक


वट सावित्री पूजन सामग्री:

वट सावित्री व्रत की पूजा में सावित्री-सत्यवान की मूर्ति, धूप-दीप-घी, 5 तरह के फल, फूल, बांस का पंखा, लाल कलावा, कच्चा सूत, सुहाग का सामान, पूड़ि‍यां, बरगद का फल, भिगोया हुआ चना, जल का कलश होना चाहिए।

कोरोना महामारी में कैसे हो पूजा विधि?

कोरोना के चलते अगर आप बरगद के पेड़ की पूजा करने नहीं जा सकते तो अपने घर पर ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पूजा कर सकते हैं। या आप बरगद के पेड़ की टहनी तोड़ कर उसे गमले में लगा लें और इसकी पूजा करें।

महिलाएं इस दिन सुबह जल्दी उठकर नहा-धोकर पवित्र हो जाएं। इसके बाद लाल या पीली साड़ी पहनकर पूरा सोलह श्रृंगार करें। अब बांस की पूजा वाली डलिया में पूजा का सारा सामान रख लें। अब वट वृक्ष के नीचे के स्थान को अच्छे से साफ़ कर वहां एक चौकी बनाकर सावित्री और सत्यवान की मूर्ति रखें। इसके बाद फूल, रोली, कलावा, अक्षत, दिया, धूपबत्ती और सिन्दूर से उनकी पूजा करे। 

इसके बाद उन्हें लाल रंग का वस्त्र और फल चढ़ाएं. इसके बाद बांस के पंखे से हवा करें। अब अपने बालों में बरगद का एक पत्ता खोंस लें और खड़े होकर 5, 11, 21, 51, 108 बार वट के पेड़ के चारों तरफ परिक्रमा करें

शनिवार

गंगा दशहरा मुहूर्त, तिथि प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है।

गंगा दशहरा का हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। इस दिन अगर प्यासों को पानी और भूखों को भोजन कराया जाए तो इससे बहुत पुण्य मिलता है।


19 जून 2021 से शुरू गंगा दशहरा

प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है। इस बार यह शनिवार, 19 जून को शाम 06 बजकर 47 मिनट से शुरू होगा और रविवार, 20 जून को शाम 04 बजकर 23 मिनट पर खत्म होगी। इस बार गंगा दशहरा दो दिन का होगा लेकिन 20 जून को ही इसे मनाया जाएगा।

gangadashahara
Ganga Dashahara


इस दिन जो भी व्यक्ति पवित्र नदी या कुंड में स्नान करता है उसे अपने सभी पापों से मुक्ति मिलती है, और दान पुण्य करके मोक्ष की प्राप्ति होती है।

हिंदू धर्म में गंगा दशहरा को मां गंगा की जयंती माना गया है। इसी दिन को मां गंगा स्वर्ग से उतरकर पृथ्वी पर आई थी और दुनिया का कल्याण किया था। तभी से इस दिन से गंगा दशहरा मनाने की शुरुआत हुई।

गंगा दशहरा मुहूर्त

दशमी तिथि आरंभ: शनिवार, 19 जून, 2021, शाम 06:50 बजे से

दशमी तिथि समापन: रविवार, 20 जून, 2021, शाम 04:25 बजे तक

ऐसे मनाए गंगा दशहरा पर्व

आप घर में रहते हुए भी गंगा दशहरा मना सकते हैं। इसके लिए आप

• गंगा दशहरा वाले दिन आप सुबह जल्दी उठकर अपने घर पर ही गंगाजल की कुछ बूंदें और हल्दी पानी में डाल के स्नान करें।

• स्नान के बाद अपने घर के पूजा वाली जगह में गंगाजल से भरा लोटा रखें और मां गंगा की पूजा करें।

• इसके बाद मां गंगा को पांच अलग-अलग प्रकार के फूल चढ़ा के "ऊँ नमो भगवते ऐं ह्रीं श्रीं हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा.." का जाप करें।

• मां गंगा को दस तरह के फूल, दस नैवेद्य, दस पान, दस पत्ते और दस तरह के फल अर्पित करें।

• और बाद में गरीबों, जरूरतमंदों या ब्राह्मणों को दान दक्षिणा दें।

गंगा दशहरा का महत्व

गंगा मां की पूजा करने से व्यक्ति को दस प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है। इसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, ईर्ष्या, ब्रह्महत्या, छल, कपट, परनिंदा जैसे पापों से मुक्ति मिल जाती है।

मां गंगा के अवतार की कथा

मां गंगा को स्वर्ग लोक से धरती पर राजा भागीरथ लेकर आए थे। इसके लिए उन्होंने कठोर तप किया था और तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा ने भागीरथ की प्रार्थना स्वीकार की थी। लेकिन गंगा मैया ने भागीरथ से कहा था कि पृथ्वी पर आते समय उनके वेग को रोकने वाला कोई चाहिए, वरना वे धरती को चीरकर रसातल में चली जाएंगी और धरती के लोग पाप से मुक्त नहीं हो पाएंगे।

तब भागीरथ ने मां गंगा की बात सुनकर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने गंगा मां को अपनी जटाओं में धारण किया।

gopal achary
पं गोपाल आचार्य

पं गोपाल आचार्य
राधा वैली मंदिर, मथुरा
9634762840

शुक्रवार

आजकल इम्‍यूनिटी को बढ़ाने के लिए विटामिन सी लेना जरूरी हो गया है लेकिन बच्‍चों को कितनी मात्रा में विटामिन सी देना चाहिए, ये जानना जरूरी है

सर्दी-जुकाम जैसे इन्फेक्शन से बचने के लिए विटामिन सी लेना जरूरी होता है और बच्‍चों के लिए ये बहुत जरूरी है। बच्‍चों की इम्‍यूनिटी बढ़ाने में विटामिन सी बहुत बड़ा हाथ होता है लेकिन इस बात का ध्‍यान रखना भी जरूरी है कि बच्‍चों के लिए विटामिन सी कितना लेना चाहिए।


vitamin c
Vitamin c



क्यों जरूरी है विटामिन C?

विटामिन सी को एस्‍कोर्बिक एसिड भी कहते है। ये खट्टे फलों जैसे सेब, बैरीज, आलू और शिमला मिर्च में पाया जाता है। यह एक ऐसा विटामिन है जो पानी में घुलनशील है जिसकी हमारे शरीर के लिए बहुत ज्यादा जरूरी है। इस विटामिन को हमारा शरीर खुद नहीं बनाता है इसलिए इसकी कमी को पूरा करने के लिए इस विटामिन को खाने के जरिए लेना पड़ता है।

• विटामिन सी घावों को जल्दी भरता है। अगर शरीर में विटामिन सी की कमी होती है तो इससे मसूड़ों की समस्या, कमजोर प्रतिरोधक क्षमता, हड्डियों और जोड़ों में दर्द, त्वचा के रूखेपन जैसी दिक्कतें होने लगती हैं।

• विटामिन सी किडनी के लिए अच्छा होता है। इससे बीपी की समस्या भी दूर होती है। अगर शरीर में विटामिन सी की कमी है तो ब्लड प्रेशर की समस्या हो सकती है।

• विटामिन सी आंखों के लिए भी अच्छा होता है। विटामिन सी से दांतों की परेशानिया भी दूर होती है। ये ब्लड शुगर के स्तर को ठीक रखता है और डायबिटीज की बीमारी से बचाता है।

• जिन बच्चों को बार-बार सर्दी-जुखाम होता है ऐसे बच्चो को विटामिन सी वाली चीज ज्यादा खिलानी चाहिए।

​बच्‍चों में विटामिन सी कमी कैसे पहचानें:

बच्‍चों में विटामिन सी की कमी बहुत कम ही होती है लेकिन खानपान से इसे आसानी से ठीक भी किया जा सकता है। विटामिन सी की कमी का पता लगाने के लिए कुछ ब्‍लड टेस्‍ट की जरूरत होती है। विटामिन सी की कमी से स्‍कर्वी की बीमारी होती है।

स्‍कर्वी की बीमारी में स्किन पर छोटे भूरे रंग के निशान, स्किन का रूखापन, मसूड़ों का मोटा होना और म्‍यूकस मेंब्रेन से खून निकलना शामिल है। इसके अलावा बच्‍चे को कमजोरी, इमोशनल बदलाव, घाव ना भरने, जैसी दिक्कते हो सकती है।

​क्‍या है विटामिन सी की सही खुराक?

1 से 3 साल के बच्‍चे को 400 मिग्रा

4 से 8 साल के बच्‍चे को 650 मिग्रा,

9 से 13 साल के बच्‍चे को 1,200 मिग्रा,

14 से 18 साल के बच्‍चे को 1,800 मिग्रा की मात्रा में विटामिन सी देना चाहिए।

कौन से है विटामिन सी वाले फूड्स?

• फल - आंवला, नारंगी, निम्बू, संतरा, बेर, पपीता, अंगूर, टमाटर, अमरुद, केला, अनानस, स्ट्रॉबेरी, अवाकाडो, सेब, खट्टे रसीले फलों में विटामिन सी पाया जाता है।

• सब्जिया - मूली के पत्ते, कटहल, शलजम, पुदीना, मक्का, चुकंदर, बंदगोभी, हरा धनिया, दालें (भिगाने के बाद), पालक, दूध आदि सब्जियों में विटीमिन सी होता है।

बुधवार

क्या है घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी? घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी की सलाह कब दी जाती है? घुटना प्रत्यारोपन कैसे किया जाता है?

घुटना प्रत्यारोपण को घुटनों का ऑपरेशन, नी ट्रांसप्लांट के नाम से भी जाना जाता है। जब व्यक्ति घुटनों के दर्द से बहुत परेशान रहता है और दिक्कत इतनी ज्यादा बढ़ जाती है कि चलने या फिर बैठने में भी बहुत दिक्कत होने लगती है तो ऐसे में घुटना प्रत्यारोपण कराया जाता है।

knee transplant
Ghutana Pratyaropan



घुटनों में दर्द की समस्या काफी तेज़ी से फैलती जा रही है, जो पुरूषों के साथ-साथ महिलाओं में भी देखने को मिलती है। भारत में 60 से 65 उम्र तक 99 प% लोगों के घुटने खराब हो जाते हैं और उन्हें ऑपरेशन का सहारा लेना पड़ता है। घुटनों का दर्द कई कारणों जैसे अधिक वजन होना, शरीर में कैल्शियम की कमी होना, हड्डियों का कमजोर होना के कारण होता है।

क्या है घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी?

घुटना प्रत्यारोण सर्जरी को आर्थोप्लास्टी भी कहते हैं। इसमें खराब घुटने को Artificial Joint से बदला जाता है।

यह जोड़ Metal Alloy, High Grade Plastics और Polymer से बना होता है, जो व्यक्ति को चलने या दूसरे काम करने में मदद करता है।

घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी की सलाह कब दी जाती है?

किसी भी व्यक्ति को डॉक्टर घुटनों का ऑपरेशन कराने की सलाह तब देते हैं, जब-

• घुटनों में दर्द होना- इस ऑपरेशन को कराने की सलाह तब दी जाती है, जब घुटनों में दर्द बहुत ज्यादा होता है।

• घुटनों में सूजन होना- जब घुटनों पर सूजन बन रहती है, तब उसे ठीक करने के लिए ऑपरेशन की जरूरत पड़ती है।

• घुटनों के ग्रीस खत्म होना- एक उम्र के बाद धीरे धीरे लोगों के घुटनों का ग्रीस खत्म होने लगता है, जिसकी वजह से उन्हें घुटनों को मोड़ने में तकलीफ होने लगती है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर ऑपरेशन कराने की सलाह देते है।

• चलने या बैठने में तकलीफ होना- जब घुटने के दर्द के कारण चलने या बैठने में दिक्कत ज्यादा बढ़ने लगती है, तो उसके लिए एकमात्र विकल्प ऑपरेशन ही बचता है।

• अन्य किसी तरीके का काम न करना- जब घुटनों के लाए कोई भी तरीके काम न करें, तब ऑपरेशन ही करना ठीक होता है।

घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी कितने प्रकार के होते हैं?

घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी तीन तरह के होते हैं:

• टोटल नी रिप्लेसमेंट- टोटल नी रिप्लेसमेंट में दोनों घुटनों या फिर एक पूरे घुटने का इलाज किया जाता है।

• पार्शियल नी रिप्लेसमेंट- इस प्रोसेस में घुटने के एक हिस्से का इलाज किया जाता है।

• रिविज़न नी रिप्लेसमेंट- इस प्रोसेस में एक घुटने के ऑपरेशन के कुछ समय बाद उसका फिर से इलाज किया जाता है।

समय पर घुटना रिप्लेसमेंट सर्जरी न करवाने से कैसे खतरे?

समय पर घुटना रिप्लेक्मेंट करवाना जरूरी है, अगर ऐसा न करवाएं, तो इससे कई दिक्कतें आ सकती हैं, जैसे:

• घुटने के आकार का बिगड़ना:

घुटने के दर्द के कारण जोड़ में सूजन के साथ रिसाव पैदा होने लगता है। और जोड़ों के आकार में बदलाव आने लगता है। जिससे पैर टेढ़ा होने लगता है और चलने में परेशानी होती है। पैर की लंबाई पर असर पड़ता है जिससे सर्जरी करना बहुत मुश्किल हो जाता है।

पैर में विकृति के कारण जिस स्थान पर सर्जरी होती है उसको ढूंढना मुश्किल हो जाता है और ऐसे में सर्जरी करने ने दिक्कत आती है समय ज्यादा लगता है।

• जोड़ों में कठोरता का बढ़ना:

दर्द और इन्फ्लमैशन बने रहने की वजह से जोड़ों को बदला नहीं जा सकता। ऐसे में मूवमेंट की कमी की वजह से मांसपेशियों, लिगामेंट में कमजोरी और अकड़न आ जाती है। इससे जोड़ सख्त हो जाते है।

जिसकी वजह से सर्जरी करने में दिक्कत आ सकती है।

• मांसपेशियों की ताकत का कम होना

दर्द के कारण मूवमेंट कम हो जाता है। मूवमेंट कम होने के कारण मांसपेशियों में कमजोरी आती है और लचीलापन जाता रहता है। सर्जरी के बाद भी ऐसी मांसपेशियों में ताकत आना मुश्किल हो जाता है।

• पोस्चर पर असर पड़ना-

जिस पैर में दर्द नहीं होता, उस पर सारा भार लेने लगते है जिसके कारण शरीर के पोस्चर पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

घुटना प्रत्यारोपण से पहले क्या क्या करना जरूरी?

इस प्रक्रिया को शुरू करने से पहले कुछ जरूरी तैयारी की जाती है, जो इस प्रकार हैं-

• मेडिकल हिस्ट्री को लेना- घुटने का ऑपरेशन करने से पहले व्यक्ति के मेडिकल हिस्ट्री को देखा जाता है, जिससे घुटने के दर्द का सही कारण पता लगाते है।

• शारीरिक जांच करना- इसके बाद व्यक्ति की शारीरिक जांच की जाती है, जिसमें उसका एक्स-रे, ब्लड टेस्ट किया जाता है।

• खाना-पीना को बंद करना- डॉक्टर घुटने के ऑपरेशन को शुरू करने के 8 घंटे पहले खाने-पीने को बंद करने को कह देते हैं।

• व्यायाम करना- सर्जरी से पहले डॉक्टर कुछ व्यायाम भी कराते हैं। ताकि मांशपेशिया नरम हो सकें।

घुटना प्रत्यारोपन कैसे किया जाता है?

इस सर्जरी में एक से तीन घंटे का समय लगता है।

ऑपरेशन शुरू करने से पहले सिडेटिव दिया जाता है, जिससे आप खुद को रिलैक्स कर पाएंगे। इसके बाद सामान्य एनेस्थीसिया दिया जाता है, जिससे आप सर्जरी के दौरान बेहोश हो जायेंगे। इसके अलावा आपको स्पाइनल एनेस्थीसिया भी दिया सकता है, जिसमें जागे रहते है लेकिन कमर के नीचे कुछ भी महसूस नहीं होता।

सर्जरी के दौरान खराब हिस्से को प्रोस्थेसिस से बदल दिया जाता है। चोट और खराबी के हिसाब से घुटने का थोड़ा सा हिस्सा या फिर पूरे घुटने को ही बदल दिया जाता है।

सर्जरी होने की प्रक्रिया-

• घुटने को खोलने के लिए उस पर एक कट लगाया जाता है ताकि घुटने के जोड़ को देखा जा सके।

• वे खराब भागों को हटा देंगे और उन्हें अच्छे से नापेंगे, जिससे उसी के आकार का प्रोस्थेटिक बनाया जा सके।

उसके बाद उसको लगाकर चेक किया जाएगा कि घुटने का जोड़ ठीक तरह से काम कर रहा है या नहीं। इसके प्रॉस्थेटिक को पूरी तरह से लगा दिया जाएगा।

• जांघ की हड्डी का आखिरी हिस्सा कर्व्ड मेटल प्रोस्थेटिक से बदला जाता है और एक पतली मेटल की प्लेट शिन बोन के आखिरी में लगा दी जाती है।

• हड्डी को ठीक करने के लिए एक कोटिंग के साथ इलाज किया जा सकता है ताकि हड्डी को प्रतिस्थापित भागों के साथ मिलाया जा सके।

• घर्षण ना हो, उसके लिए मेटल के टुकड़ों के बीच एक प्लास्टिक स्पेसर लगा दिया जाता है जो कार्टिलेज की तरह काम करता है।

• जरूरत पड़ने पर नी कैप के पिछले भाग को भी बदला जा सकता है।

• और सर्जरी पूरी हो जाने के बाद घाव को स्टेपल और टांकों की मदद से बंद करके ड्रेसिंग की जाती है।

घुटना प्रत्यारोपण के बाद क्या सावधानियां रखनी चाहिए?

घुटना प्रत्यारोपण के बाद एक फिजियोथेरेपिस्ट से मिलना चाहिए ताकि वो आपको सही व्यायाम बता सके। ऐसा तब तक किया जाता है जबतक आपकी मांसपेशिया मज़बूत नही हो जाते और घुटना ठीक तरह से कार्य नहीं करने लगता।

सर्जरी के बाद विशेष देखरेख करनी होती है और निर्देशों का पालन करना होता है, जैसे -

नहाना -

• नहाने में आपको सर्जरी वाली जगह गीला नही होने देना है इसलिए संभल के नहाना चाहिए।

• कोई भी साबुन, बॉडी लोशन, टेलकम पाउडर का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

• अगर ड्रेसिंग वाटर प्रूफ है तो आप उसे लगे रहने दे लेकिन अगर यह गीली हो सकती है तो आपको उसे उतार देना चाहिए।

• घाव को एक साफ़ और सूखे तौलिये से हल्के हाथ से पोछे।

ड्रेसिंग -

ड्रेसिंग करने से पहले निम्न बातों को ध्यान रखना जरूरी है -

• अपने हाथों को साबुन और पानी से ठीक से धो लें।

• घाव को उंगलियों से छुए बिना ड्रेसिंग खोले।

• ड्रेसिंग में कोई भी एंटीसेप्टिक क्रीम ना इस्तेमाल करें।

डॉक्टर के द्वारा दी हुई दवाइयां लेते रहिए।

गाड़ी चलाना शुरू न करें।

नहाते समय कुर्सी का प्रयोग करें।

नहाने के लिए पाइप वाले शावर का यूज करें या फिर स्पॉन्ज बाथ लें।

क्रचेज, वॉकर या छड़ी की मदद से ही चलने की कोशिश करनी चाहिए।

हल्के एक्सरसाइज करें जिससे घुटना जल्द से जल्द मूव करने लगे।

नी रिप्लेसमेंट सर्जरी के क्या हैं फायदे?

1.नी रिप्लेसमेंट होने के बाद दर्द कम हो जाता है और पैरों को अच्छी तरह से मूव करा सकते है।

3. जोड़ों में मूवमेंट ठीक बनी रहती है और टिश्यू को नुकसान नही पहुंचता है।

4.सर्जरी के 2 हफ्ते बाद उठने- बैठने और घुटनों को मोड़ने में भी परेशानी नहीं होती है।

5. सर्जरी के बाद जमीन पर भी आसानी से बैठा जा सकता है।

6. ठीक हो जाने के बाद बिना किसीnसहारे के चल सकते हैं।

जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी के क्या है नुकसान?

1. घुटना प्रत्यारोपण के कुछ दिनों बाद हड्डियों में दरारें आ सकती हैं, इसके अलावा नर्व डैमेज होने के भी चांस रहते हैं।

2.खून के थक्के बन सकते हैं।

3. लिगामेंट भी डैमेज हो जाते हैं।

4. अनकंर्फ्टेबल महसूस हो सकता है।

5. घुटनों में दर्द और जकड़न महसूस हो सकता है।

डॉक्टर के पास कब जाएं?

• सर्जरी हुई जगह पर दर्द हो;

• बुखार और कंपकंपी आए;

• जिस टांग पर सर्जरी की गई है उस पर झुनझुनी लग सकती है;

• सर्जरी के स्थान से किसी भी तरह का रक्तस्त्राव, लालिमा, सूजन हो।

सबसे ज्यादा पूछे जाने वाले सवाल

Q1. घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी के बाद भी दर्द होता है या नही है?
Ans- कुछ लोगों को सर्जरी के बाद भी घुटने में दर्द होता है। ज्यादातर लोगों में ये दर्द बहुत कम हो जाता है और आराम मिलता है।

Q2. घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी के बाद पूरी तरह से ठीक होने में कितना समय लग जाता है?
Ans- सर्जरी कराने वाले व्यक्ति के ठीक होने की बात इस चीज़ पर निर्भर करती है, कि वह अपना कितना ख्याल रखता है। वैसे, सर्जरी के बाद 3 से 6 हफ्ते में आराम मिल जाता है।

Q3. क्या घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी काफी बड़ी सर्जरी होता है?
Ans- जी हां, घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी काफी बड़ी सर्जरी होती है क्योंकि इसमें डॉक्टर खराब घुटने को निकालकर उसकी जगह पर कृत्रिम घुटने को लगाते हैं।

Q4. क्या घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी असफल साबित हो सकती है?
Ans- कुछ लोगों के लिए घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी असफल हो सकता है। उन्हें इसके बाद इंफेक्शन हो जाता है, जिसके बाद उन्हें फिर से कराने की जरूरत पड़ सकती है।

Q5. घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी के बाद किन चीज़ों का परहेज़ करना चाहिए?
Ans- घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी के बाद बहुत सावधानी रखनी चाहिए, जैसे उठते या बैठते समय घुटने को न मोड़ना, ठंडी चीज़े न खाना शामिल हैं।

Q6. क्या घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी के बाद अकेले रह सकते हैं?
Ans- नहीं, घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी के बाद किसी भी व्यक्ति को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि उसे कभी भी मेडिकल सहायता की जरूरत पड़ सकती है।

Q7. घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी के बाद घुटने में रात में दर्द ज्यादा होता है क्या?
Ans- रात में मौसम ठंडा होने के कारण घुटने की मांसपेशियों में खिंचाव आने लगता है, जिससे दर्द हो सकता है।

Q8. क्या घुटने की प्रत्यारोपण सर्जरी सफल कम होती है?
Ans- घुटने प्रत्यारोपण सर्जरी की सफलता दर के बारे में कई लोगों को गलत धारणा है। देखा जाए तो, घुटने की प्रत्यारोपण सर्जरी के बाद सफलता दर 98% है। लेकिन सर्जरी की सफलता कुछ चीजों पर निर्भर करती है, जैसे कि सर्जरी सफलतापूर्वक हुई की नही, सर्जरी के बाद देखभाल कैसी हो रही, नियमित फिजियोथेरेपी हो रहा या नही, संक्रमण से बचने के लिए सर्जन एवं आहार विशेषज्ञ द्वारा निर्धारित आहार का पालन किया जा रहा या नही, शारीरिक व्यायाम हो रहा या नही।

Q9. घुटने की प्रत्यारोपण सर्जरी के बाद घुटना मोड़ना या जमीन पर बैठना मुश्किल हो जाता है?
Ans- लोगो को लगता है कि घुटने के प्रत्यारोपण सर्जरी के बाद घुटने मोड़ना और बैठना मुस्किल है। लेकिन ऐसा नही है, आप पहले की तरह शारीरिक गतिविधियाँ और अपने कार्य कर सकते है।

Q10. घुटने की प्रत्यारोपण सर्जरी 5-10 साल से ज्यादा नहीं चलती है?

Ans- रिकॉर्ड के अनुसार घुटने की प्रत्यारोपण सर्जरी 15 से 20 साल तक चलती है। लेकिन घुटने की प्रत्यारोपण सर्जरी किस प्रकार की की गई है, उस पर भी निर्भर करता है।

Q11. सर्जरी से ठीक होने में 2 वा 3 महीनों का समय लगता है?
Ans- किसी भी सर्जरी की रिकवरी में थोड़ा समय तो लगता है। लेकिन रिकवरी का समय 14 दिन का होता है।

Q12. 60 साल की उम्र के बाद घुटने की प्रत्यारोपण सर्जरी सफल नहीं होती?
Ans- घुटने की प्रत्यारोपण सर्जरी उन लोगों की भी की जा सकती है जो 60 वर्ष से भी अधिक आयु के हैं। वृद्ध लोगों में घुटने की प्रत्यारोपण सर्जरी अधिक फायदेमंद है क्योंकि इसी उम्र में घुटने के जोड़ खराब हो जाते है और जोड़ों में असहनीय दर्द की दिक्कत होती है ।

Q13. घुटने की प्रत्यारोपण सर्जरी के बाद वाहन नहीं चला सकते है?
Ans- घुटने की प्रत्यारोपण सर्जरी के बाद ड्राइविंग करना आसान हो जाता है और सर्जरी के 6-8 सप्ताह के अंदर ड्राइविंग शुरू कर सकते है।

Q14. मधुमेह, उच्च रक्तचाप या किसी हृदय रोग से पीड़ित होने पर घुटने की प्रत्यारोपण सर्जरी नहीं की जा सकती है?
Ans- मधुमेह या उच्च रक्तचाप या हृदय रोग से पीड़ित लोग भी घुटने कि प्रत्यारोपण सर्जरी करा सकते है। घुटने की प्रत्यारोपण सर्जरी से पहले हर मरीज़ की सर्जिकल प्रोफाइल किनजांच की जाती है जिससे डॉक्टर पता करते है की मरीज़ सर्जरी के लिए स्वस्थ है या नहीं। सारे सेफ्टी प्रोटोकॉल देखने के बाद ही प्रत्यारोपण सर्जरी की जाती है।

Q15. सर्जरी के बाद अस्पताल में लम्बे समय तक रहना पड़ता है?
Ans- नहीं, वास्तव में, मरीज़ को सर्जरी के बाद 2-3 दिनों के भीतर छुट्टी दे दी जाती है।

Q16. सर्जरी के बाद लगातार फिजियोथेरेपी करानी पड़ती है?
Ans- हां, लेकिन सिर्फ रिकवरी होने तक। सर्जरी के बाद मरीज़ो को ठीक होने के लिए 15 से 20 दिन फिजियोथेरेपी की सलाह दी जाती है ।

मंगलवार

सरकार ने रद्द की सीबीएसई 12वीं की बोर्ड परीक्षा

CBSE12वीं की बोर्ड परीक्षा पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लंबी बैठक के बाद इसे कैंसिल करने का फैसला लिया है। आइये जानते हैं-



CBSE बोर्ड परीक्षाओं को लेकर लंबे समय से चल रहे संशय पर आज निर्णय हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में इस मुद्दे पर एक अहम बैठक हुई, जिसमें सीबीएसई की 12वीं बोर्ड की परीक्षाओं को रद्द करने का बड़ा फैसला लिया गया।

पीएम नरेंद्र मोदी ने आज इस पर व्यापक चर्चा के बाद परीक्षा को रद्द करने का फैसला लिया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि सीबीएसई की 12वीं की परीक्षा रद्द करने का फैसला छात्रों के हित में लिया गया है.। उन्होंने कहा कि कोविड-19 ने अकादमिक कैलेंडर को प्रभावित किया है और बोर्ड परीक्षाओं का मुद्दा छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों में अत्यधिक चिंता पैदा कर रहा है, जिसे समाप्त किया जाना चाहिए।

क्या होता है किडनी ट्रांसप्लांट? कब पड़ती है किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत? किडनी ट्रांसप्लांट में कितना आता है खर्च?

किडनी और उसकी ज़िम्मेदारी

किडनी बीन के आकार का होता है, जो रीढ़ के दोनों तरफ़ होती हैं। ये आंत के नीचे और पेट के पीछे की तरफ़ होती है। किडनी खून से वेस्ट को फिल्टर करते हैं और मूत्र के माध्यम से इसे शरीर से निकाल देते हैं।

kidny Transplant
Kidny Transplant


जब किडनी काम करना बंद कर देता है। जिससे वेस्ट मैटेरियल शरीर में जमा होने लगता है, जिससे शरीर में धीरे धीरे बीमारियां आने लगती है। जब किडनी का काम करना 90% से कम हो जाता है, तो ऐसे किडनी फेलियर हो जाता है।

ऐसे लोगों को शरीर से कचरा निकालने और जीवित रहने के लिए डायलिसिस की जरूरत पड़ती है।

क्या होता है किडनी ट्रांसप्लांट?

किडनी ट्रांसप्लांट में एक स्वस्थ व्यक्ति (kidney donor) से किडनी लेकर मरीज के शरीर में सर्जरी करके लगाई जाती है।


किडनी ट्रांसप्लांट तीन तरह से किया जा सकता है:

1. लिविंग डोनर ट्रांसप्लांट – सबसे ज्यादा किडनी ट्रांसप्लांट लिविंग डोनर से ही होता है। इसमें एक स्वस्थ व्यक्ति से उसकी एक किडनी दान में ली जाती है और उनकी दूसरी किडनी अपना काम वैसे थी ठीक तरह से करती रहती है।

2. पेयर किडनी एक्सचेंज – जब एक जीवित डोनर तो होता है लेकिन उनके किडनी, रोगी के किडनी से नहीं मैच नहीं हो पाती तो ऐसे में एक ऐसे किडनी डोनर को ढूंढा जाता है जिनसे किडनी बदल लिया जाता है।


3. मृत डोनर ट्रांसप्लांट – जब किसी कारण से किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और उनके करीबी उसके अंगों का दान करने का फैसला करता है। तो ऐसे में इस मृत व्यक्ति की किडनी ट्रांसप्लांट करके लगाई जाती है।



कब पड़ती है किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत?

• किडनी खराब होने के बाद जब खून के वेस्ट मैटेरियल जमा होने लगे।

• जब किडनी खराब होने पर मृत्यु का कारण बनने लगे।

• डायलिसिस के दुष्प्रभावों से बचने के लिए।

• जब रोगी की हालत गंभीर होने लगे।

• विलिंग किडनी डोनर मौजूद हो।

कब नही करवा सकते किडनी ट्रांसप्लांट?

• हृदय की गंभीर बीमारी होने पर ;

• वृद्धावस्था में;

• कैंसर हो या कभी कैंसर रह चुका हो तो;

• मानसिक बीमारी होने पर;

• मनोभ्रंश होने पर;

• धूम्रपान या मदिरा का सेवन करने वाली पर;

• लिवर की कोई बीमारी;

• गंभीर इनफिक्शन जैसे टीबी आदि होने पर।

क्या है किडनी ट्रांसप्लांट की सफलता दर?

किडनी ट्रांसप्लांट के बाद, मरीज की ट्रांसप्लांट किडनी उसके खून को साफ करने में फिर से तैयार हो जाती है। डायलिसिस पर रह रहे मरीजों के लिए बहुत अच्छा होता है क्योंकि इसके बाद उन्हें डायलिसिस की जरूरत नहीं होती।

लेकिन किडनी ट्रांसप्लांट एक कठिन और जरूरी सर्जरी भी है। इसलिए सर्जरी की सफलता दर 100% नहीं होती है। किडनी ट्रांसप्लांट की सफलता दर, किडनी डोनर के जीवित या मृत होने पर निर्भर करती है। किडनी डोनर अगर जीवित है, तो सर्जरी की सफलता दर 90-95% होगी लेकिन अगर वो मृत है तो सफलता दर 85-90% होगी।

डायलिसिस से किडनी ट्रांसप्लांट बेहतर क्यों है?

• किडनी की कार्यक्षमता डायलिसिस से बेहतर होती है।

• बार बार डायलिसिस सेंटर जाने की जरूरत नहीं होती।

• ट्रांसप्लांट के बाद जीवन, डायलिसिस पर चल रहे जीवन से काफी हद तक अच्छी हो जाती है।

• डायलिसिस में खर्च भी ज्यादा और बार बार होता रहता है, लेकिन ट्रांसप्लांट के बाद किडनी के काम करने पर यह खर्च कम हो जाता है।

• डायलिसिस पर रह रहे मरीजों पर खाने पीने का परहेज ज्यादा होता है और प्रत्यारोपण के बाद आप आराम से सब कुछ खा सकते है।

किडनी ट्रांसप्लांट से पहले क्या तैयारी करनी होती है?

किसी भी काम को करने से पहले हमें कुछ तैयारिया, कुछ योजनाएँ बनाने की जरूरत होती है। जो इस प्रकार हैं-

1. किडनी डोनर को खोजना

किडनी ट्रांसप्लांट कराने के लिए सबसे जरूरी है, किडनी यानि किडनी डोनर ढूँढना। किडनी डोनर दो प्रकार के होते हैं- जीवित और मृत

2. ट्रांसप्लांट से पहले किडनी डोनर का पूरा परीक्षण करना

किडनी डोनर के मिलने के बाद डोनर का परीक्षण कराने की जरूरत सबसे पहले होती है जैसे- डोनर का खून का परीक्षण, टिशूज का प्रकार आदि। किस से ले सकते हैं आप किडनी-

मरीज का रक्त समूह किस रक्त समूह से आप ले

हैं किडनी

0 0

A A,0

B B,O

AB O, A, B, AB


इससे मरीज और डोनर का genes देखा जाता है। यदि डोनर और मरीज के Tissue आपस में मिलते हैं तो मरीज के शरीर में ट्रांसप्लांट किडनी ठीक से काम करना शुरू कर सकती है।

3. सर्जरी से पहले किये जाने वाले टेस्ट

सर्जरी से पहले कई टेस्ट किए जाते है, जिनके आधार पर सर्जरी की तारिक तय की जाती है। यह इसलिए हुई जरूरी है, क्योंकि सर्जरी के दौरान एनेसेथियासा का यूज भी किया जायेगा और सर्जरी बिना किसी रुकावट के हो जाए।

4. सर्जरी से पहले एनेस्थीसिया की जांच

एनेसेथिसिया देने पर पाचन क्रिया बंद हो जाती है। यदि रोगी ने सर्जरी से पहले कुछ खाया है तो वो पेट से निकल कर फेफड़ों में चली जाती है और इससे सांस की दिक्कतें आ सकती है, इसलिए सर्जरी के हिसाब से एनेस्थीसिया चुना जाता है।

5. सर्जरी की योजना

सर्जन और मरीज के लिए पूर्व तैयारी, इसके फायदे नुकसान, सर्जरी के बाद की जाने वाली देखभाल पर योजना बनाना जरूरी होता है। जिससे डॉक्टर को मरीज की हर चीज पहले से पता हो।

6. सर्जरी से पहले निर्धारित की गयी दवाइयाँ

सर्जरी से पहले डॉक्टर कुछ दवाइयां देता है, इसलिए इन दवाओं को ठीक तरह से लेते रहना चाहिए।

7. सर्जरी से पहले फास्टिंग खाली पेट रहना

डॉक्टर आपको आधी रात से कुछ भी खाने के लिए मना कर सकते है। इसलिए डॉक्टर की बात जरुर माने। क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया गया तो सर्जरी रोकी भी जा सकती है।

8. सर्जरी का दिन

सर्जरी के दिन एक सहमती पत्र पर साइन करवाया जाता है। इसके बाद bp, pulse, temperature, देखा जाता है

9.सामान्य सलाह

सर्जरी से पहले धूमपान बंद कर दे, इससे रिकवरी होने में देरी होती है। किसी न किसी को अपने साथ जरूर रखें। किसी भी तरह का तनाव न ले।

किडनी ट्रांसप्लांट कैसे किया जाता है?

जैसे ही एनेस्थीसिया अपना प्रभाव पूरी तरह आ जाता है, सर्जन पेट में एक चीरा लगाकर डोनर के किडनी को अंदर रख देते है। उसके बाद डॉक्टर मरीज के धमनियों और नसों से नए किडनी की धमनियां और नसें जोड़ देते हैं। इससे नए किडनी में खून का प्रवाह शुरू हो जाता है। फिर नए किडनी की मूत्रनली को मरीज के मूत्राशय से जोड़ दिया जाता है, जिससे पेशाब करना आसान हो जाता है। डॉक्टर मरीज की किडनी को शरीर में ही रहने देते जब तक कि वो बीपी या इन्फेक्शन जैसी दिक्कतें न आ रही हों। इसके बाद सर्जिकल धागों की मदद से चीर को सिल दिया जाता है।

गुर्दा प्रत्यारोपण के बाद कैसी देखभाल के जाती है?

अस्पताल में देखभाल

• होश आने के बाद अस्पताल में शारीरिक परीक्षण किया जाता है। बीपी, पल्स और श्वास स्थिर हो जाने पर ICU में शिफ्ट कर देते है। इसके कुछ समय बाद आपको अस्पताल के सामान्य कमरे में शिफ्ट कर दिया जाता है। लगभग एक हफ्ते तक अस्पताल में ही रहना होता है।

• नए गुर्दे तुरंत ही फ़िल्टर करने का काम शुरू कर सकते हैं लेकिन कई बार इसमें कुछ हफ्ते भी लग सकते हैं। परिवार के सदस्यों द्वारा डोनेट किभी किडनी अन्य डोनर्स के किडनी के मुकाबले जल्दी काम करना शुरू कर देते हैं।

• मूत्राशय में एक मूत्र के लिए थैली लगा दी जाती है।

जब तक कि खुद से खाना पीना नहीं खा सकते है। तब तक लिक्विड चीजे ही दी जाती है। धीरे धीरे ठोस आहार देना शुरू कर दिया जाता है।

• दर्द के लिए डॉक्टर दर्द निवारक दवाइया दे सकते हैं।

• अस्पताल से छुट्टी मिलने से पहले डॉक्टर अच्छे से समझा देते है कि कौन सी दवा कब लेनी है।

घर में रिकवरी

• घर जाने के बाद डॉक्टर बीच बीच में जांच के लिए बुलाते है कि नया गुर्दा सही से कार्य कर रहा है या नहीं।

• घाव को साफ़ और सूखा रखना ज़रूरी है।

• डॉक्टर के कहने पर टांके खुलवाने जाना चाहिए।

• ऐसी जगहों पर जाने से बचना चाहिए जहाँ कोई बीमार हो क्योंकि ट्रांसप्लांट के बाद में इम्यून सिस्टम थोड़ा कमज़ोर हो जाता है। इसलिए सावधानी बरतनी जरूरी है।

• आपको दवाओं का कड़े शिड्यूल का आजीवन पालन करना होगा।

किडनी ट्रांसप्लांट के बाद क्या सावधानियां बरतें?

• कुछ महीनों तक डॉक्टर से नियमित रूप से मिलते रहना चाहिए।

• इनफेक्शक से बचना चाहिए।

• वजन कंट्रोल करके रखना चाहिए।

• वाहन नहीं चलाना चाहिए या सफर नही करना चाहिए।

• शारीरिक गतिविधियां कम करनी चाहिए जैसे झटके से उठना बैठना लेटने से बचना चाहिए।

• शारीरिक संबंध नहीं बनाना चाहिए।

• प्रेगनेंसी से बचना चाहिए।

• नशीले पदार्थो से दूर रहना चाहिए।

• पालतू जानवर से दूर रहना चाहिए।

किडनी ट्रांसप्लांट में क्या जोखिम आते हैं?

• एनेस्थीसिया की वजह से एलर्जी हो सकती है

• रक्तस्त्राव हो सकता है

• रक्त के थक्के बन सकते हैं

• मूत्रनली में स्त्राव हो सकता है

• मूत्रनली में ब्लॉकेज हो सकता है

• इन्फेक्शन का डर रहता है

• डोनेट किये हुए गुर्दे का शरीर द्वारा रिजेक्शन किया जा सकता है।

• डोनेट किये हुए गुर्दे का फेलियर हो सकता है

• डायबिटीज होने का डर रहता है

किडनी ट्रांसप्लांट में कितना आता है खर्च?

भारत के निजी अस्पतालों में किडनी ट्रांसप्लांट का खर्च 6 लाख से 7लाख तक आता है लेकिन शरीर द्वारा किडनी का रिजेक्शन या इन्फेक्शन हो जाए तो खर्च बढ़ सकता है। सर्जरी के बाद दवाओं और अन्य चीजों का खर्च लगभग 10 हजार से 15 हजार तक बैठ जाता है।

किडनी ट्रांसप्लांट के बाद कैसा हो खान-पान?

डायलिसिस के मुकाबले किडनी ट्रांसप्लांट के बाद खाने पीने में अधिक छूट रहती है। नई किडनी के अनुसार संतुलित और पौष्टिक आहार लेना जरूरी रहता है। आहार इस बात पर निर्भर करता है कि नई किडनी कितनी अच्छी तरह काम कर रही है। कुछ भी खाने से पहले ये जरूर ध्यान रखना चाहिए की नई किडनी के लिए वो ठीक है की नहीं। ट्रांसप्लांट के बाद दवाओं से बीपी, कोलेस्ट्रॉल और डायबिटीज बढ़ने का खतरा रहता है। दावा लेने की वजह से हड्डियां भी कमज़ोर होने लगती हैं, इसलिए कैल्शियम की मात्रा ज्यादा लेनी चाहिए।

खाने में एक संतुलित आहार की जरूरत होती है जैसे- विटामिन, प्रोटीन, कार्बोहाईट्रेट, वसा, फाइबर आदि।

इसके अलावा तरल पदार्थ भी ज्यादा लेना चाहिए।

जो भी खाना चाहिए वह सही से पका हुआ होन चाहिए ताकि उससे इन्फेक्शन होने का डर न रहें।

स्वयं की भी सफाई भी जरूरी है, इसलिए समय-समय पर हाथ धोते रहना चाहिए।

किडनी ट्रांसप्लांट के बाद क्या नहीं खाना चाहिए?

1. कच्चा, पक्का या अधपका मांस

• मछली

• मुर्गी

• केकड़ा

2. डेयरी प्रोडक्ट्स

• दूध

• पनीर

• दही

• कच्चे या कम उबले हुए अंडे

3. फल और सब्जियां

• अंगूर या अंगूर का रस

• अनार या अनार का रस

• कच्चे फल

• कच्ची सब्जियां

• बिना पका हुआ सलाद

• सिरका

• स्प्राउट्स

4. एंटी-इंफ्लामेट्री दवाएं

• आइबूप्रोफेन

• नेप्रोक्सेन

5. विटामिन्स और हर्बल्स सप्लीमेंट

• सेंट जॉन्स पौधा

• हर्बल चाय

Mathura Vrindavan

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