सोमवार

डिप्रेशन क्या होता है? डिप्रेशन के कारण क्या हैं? डिप्रेशन के लक्षण क्या हैं? डिप्रेशन का उपचार कैसे कर सकते हैं?

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में हमने कभी न कभी स्वयं को उदास और हताश महसूस किया होगा। असफलता, संघर्ष और किसी अपने से बिछड़ जाने के कारण दुखी होना तो सामान्य है। लेकिन यही अप्रसन्नता, दुःख, लाचारी, निराशा जैसी भावनायें कुछ दिनों से लेकर कुछ महीनों तक बनी रहती है और इसकी वजह से अगर व्यक्ति को अपने कार्य करने में मुश्किलें आ रहीं हैं तब यह डिप्रेशन का संकेत हो सकता है।
what is depression


दुनियाभर में लगभग 30 करोड़ से ज़्यादा लोग डिप्रेशन से ग्रस्त है। और सिर्फ भारत में ही 5 करोड़ से ज़्यादा लोग इस समस्या से घिरे हुए है और उन्हें पता भी नही होगा, की वो डिप्रेशन का शिकार हैं।

आमतौर पर डिप्रेशन 30 से 40 साल की उम्र में शुरू होता है लेकिन यह किसी भी उम्र में हो सकता है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं में डिप्रेशन की समस्या सबसे ज़्यादा होती है।

डिप्रेशन क्या होता है?

डिप्रेशन को मूड डिसऑर्डर और अवसाद भी कहा जाता है। ये कुछ देर रहने के बाद अपने आप ठीक हो जाती हैं, लेकिन कुछ लोगो में डिप्रेशन बहुत गंभीर होता हैं। ऐसे, लोग के मन में निराशा, दुख भर जाता है, जिसके कारण वह अपने रोजमर्रा के काम भी ठीक से नहीं कर पाते हैं।

हमारे जीवन में थोड़ा बहुत तनाव तो होता ही है। लेकिन यह कभी-कभी अच्छा भी होता है जिससे हम अपने कार्य को दबाव के कारण अच्छे से और समय पर कर पाते है और कार्य करते वक्त उत्साह भी बना रहता है। लेकिन जब यह तनाव अधिक और अनियंत्रित हो जाता है तो यह हमारे मस्तिष्क और शरीर पर नकारात्मक प्रभाव डालता है और यह तनाव डिप्रेशन में बदल जाता है। डिप्रेशन उस व्यक्ति को होता है जो हमेशा तनाव में रहता है।

डिप्रेशन के कारण क्या हैं?

डिप्रेशन के बहुत सारे कारण होते है, जो नीचे दिए गए हैं-

• शोषण के कारण- डिप्रेशन का प्रमुख कारण शोषण होना है।

जिन लोगों का शारीरिक शोषण होता है, ऐसे लोगों में डिप्रेशन होने की संभावना अधिक रहती है।

• दवाई के सेवन से- कई बार दवाई के साइड-इफेक्ट्स से भी डिप्रेशन होता है।

इसलिए अगर किसी व्यक्ति का कोई इलाज चल रहा है, तो उसे दवाई का सेवन सीमित रूप में ही करना चाहिए ताकि उसे किसी तरह का साइड-इफेक्ट् न हो।

• झगड़ा होना- घर के माहौल का असर बच्चों और परिवार के दूसरे सदस्यों पर पड़ता है।

इसलिए अगर परिवार में काफी झगड़े होते हैं, तो घर के सदस्यों पर इसका बुरा असर पड़ता है जिसकी वजह से वो डिप्रेशन का शिकार होने लगते हैं।

• प्रियजन की मौत से- किसी भी शख्स के लिए अपने प्रियजनों को खोना काफी दुखदायी होता है।

इसका असर मानसिक सेहत पर पड़ता है, जिसकी वजह से लोग डिप्रेशन का शिकार होने लगते है।

• जेनेटिक कारण से- डिप्रेशन का एक कारण जेनेटिक भी होता है।

इसलिए यदि किसी शख्स के परिवार में कोई दूसरा व्यक्ति डिप्रेशन से पीड़ित है, तो उसे भी यह बीमारी हो सकती है।

डिप्रेशन के लक्षण क्या हैं?

लगभग आधे लोग जिन्हें डिप्रेशन होता है लेकिन उन्हें इसका पता नही होता है, इसलिए इसके लक्षणों के बारे में जानना जरूरी है ताकि समय पर इसका इलाज शुरू किया जा सके-

1. मूड संबंधी लक्षण (Mood) :

• गुस्सा आना (Anger)

• आक्रामक होना (Aggressiveness)

• चिड़चिड़ापन आना (Irritability)

• चिंता करना (Anxiousness)

• बेचैनी होना (Restlessness)


2. भावना संंबंधी लक्षण (Emotional) :

• बर्बाद होने की भावना आना (Feeling Empty)

• उदास/दुख होना(Sad)

• निराशा आना (Hopeless)

3. व्यवहार संबंधी (Behavioral) :

• किसी काम में मन न लगना (Loss Of Interest)

• मनपसंद काम करने में खुशी न मिलना (No Longer Finding Pleasure In Favorite Activities)

• थकान होना (Feeling Tired )

• आत्महत्या के विचार आना (Thoughts Of Suicide)

• बहुत ज्यादा शराब पीना (Drinking Excessively)

• ड्रग्स का इस्तेमाल करना (Using Drugs)

• खतरनाक कामों की कोशिश करना (Engaging In High-Risk Activities)

4. सेक्स संबंधी (Sexual) :

• यौनेच्छा में कमी आना (Reduced Sexual Desire)

• शीघ्रपतन की समस्या होना (Lack Of Sexual Performance)

5. संज्ञा संबंधी (Cognitive) :

• ध्यान केंद्रित करने में असमर्थ होना (Inability To Concentrate)

• काम पूरा करने में मुश्किल होना (Difficulty Completing Tasks)

• बातचीत के दौरान देर से जवाब दे पाना (Delayed Responses During Conversations)

6. नींद संबंधी (Sleep) :

• अनिद्रा होना (Insomnia)

• नींद कम आना (Restless Sleep)

• बहुत ज्यादा नींद आना (Excessive Sleepiness)

• पूरी रात न सो पाना (Not Sleeping Through The Night)

7. शरीर संबंधी (Physical) :

• थकान होना (Fatigue)

• दर्द होना (Pains)

• सिरदर्द होना (Headache)

• पाचन में समस्या होना (Digestive Problems)

डिप्रेशन कितने प्रकार के होते हैं?

1. मेजर डिप्रेशन:

इस स्थिति में व्यक्ति का व्यवहार बदलता रहता है। जो व्यक्ति की रोज़ की गतिविधियों और व्यक्तिगत सम्बन्धों पर प्रभाव डालता है।

2. बाई पोलर डिसॉर्डर:

इसे मैनिक डिप्रेशन भी कहेते हैं। इसमें व्यक्ति को चिडचिडापन, ग़ुस्सा, मतिभ्रम जैसी चीजें होती है। इसके अलावा व्यक्ति कभी अचानक निराश हो जाता है तो दुसरे ही पल ख़ुश होने लगता है।

3. सायकलोथमिक डिसॉर्डर:

इसमें डिप्रेशन के लक्षण बहुत ज्यादा नहीं होते हैं। इसमें माइल्ड डिप्रेशन और ह्यपोमानिया देखा जाता है।

4. डिस्थीमिक डिसऑर्डर:

इसमें व्यक्ति को दो वर्ष या उससे अधिक समय तक डिप्रेशन हो सकता है। इसमें व्यक्ति खुद को अस्वस्थ महसूस करता है तथा दैनिक कार्य भी ठीक से नहीं कर पाता है।

5. पोस्टमार्टम डिप्रेशन:

यह एक गम्भीर समस्या है जो बच्चे के जन्म के कुछ महीनो बाद माँ को हो सकता है। कई बार मां गर्भपात से भी इस स्थिति में जा सकती है।

6. सीकोटिक डिप्रेशन:

यह एक बहुत ही गम्भीर समस्या है, इसमें लोग मतिभ्रम, तर्कहीन विचार और ऐसी चीज़ें देखना सुनना शुरू कर देते है, जो वास्तविक में नहीं होता हैं।

7. अनाक्लिटिक डिप्रेशन:

यह डिप्रेशन नवजात शिशु में पाया जाता है। जो बच्चे अपनी माँ से अलग हो जाते हैं और माँ का प्यार ना मिल पाने से शिशु डिप्रेशन का शिकार हो जाता है।

8. एटिपिकल डिप्रेशन:

ये डिप्रेशन युवाओं में पाया जाता है। इन मरीजों में कार्बोहाड्रेट क्रेविंग भी पायी जाती है।

9. सीज़नल अफेक्टिव डिसऑर्डर:

यह डिप्रेशन मौसम के अनुसार होता है और स्प्रिंग या सर्दियों में शुरू होता है और गर्मियों में ख़त्म।

डिप्रेशन का परीक्षण कैसे किया जाता है?

जैसे किसी बीमारी की पहचान समय रहते कर ली जाए, तो उसका इलाज सही से किया जा सकता है। ऐसे ही अगर डिप्रेशन का पता भी समय रहते लगा लिया जाए तो डिप्रेशन भी जल्दी ही ठीक हो सकता है।

ऐसे डिप्रेशन का पता लगाने के 5 तरीके हैं जो नीचे दिए गए है-

• मनोवैज्ञानिक से बात करके:

मनोवैज्ञानिक से बात करके डिप्रेशन का पता लगाना सबसे आसान तरीका है।

इसमें डॉक्टर व्यक्ति से उसके इतिहास, पारिवारिक माहौल, स्वास्थ संबंधी सवाल पूछते हैं, जिससे ये पता लगाया जा सके की उस व्यक्ति को किसी तरह की समस्या तो नहीं है।

• ब्लड टेस्ट करके-

डिप्रेशन दूसरी बीमारियों से भी हो सकता है, इसलिए डॉक्टर ब्लड टेस्ट करके डिप्रेशन का पता लगाते हैं।

• मेडिकल हिस्ट्री की जांच करके-

डॉक्टर डिप्रेशन का पता लगाने के लिए मेडिकल हिस्ट्री की भी जांच करते हैं।

• लाइफ स्टाइल संबंधी बात करके-

कई बार, डॉक्टर डिप्रेशन का पता लगाने के लिए लोगों की लाइफ स्टाइल के बारे में भी जानते है।

• स्वभाव में होने वाले बदलावों पर बात करके-

डिप्रेशन के कारण स्वभाव में भी अंतर आने लगता है, इसलिए डॉक्टर इसके बारे में पता करने के लिए स्वभाव में होने वाले बदवालों को लेकर बात कर सकते हैं।

डिप्रेशन का उपचार कैसे कर सकते हैं?

जैसे ही किसी व्यक्ति के डिप्रेशन होने का पता चलता है, उसका इलाज शुरू करना जरूरी होता है जिससे उसके आगे आने वाले खतरों से बचाया जा सके।

इसलिए डिप्रेशन का इलाज निम्नलिखित तरीके से किया जा सकता है-

• दवाई के द्वारा:

डिप्रेशन को ठीक करने का सबसे आसान तरीका दवाई लेना है। ये दवाई दिमाग की मांसपेशियों को शांत करके व्यक्ति को ठीक करने में मदद करती हैं।

• साइकोथेरेपी के द्वारा:

डिप्रेशन का इलाज साइकोथेरेपी के द्वारा भी किया जाता है।

इस थेरेपी के द्वारा पीड़ित व्यक्ति के स्वभाव, सामाजिक वातावरण को मॉनिटर किया जाता है और उसी हिसाब से इलाज करने की कोशिश की जाती है।

• लाइट थेरेपी के द्वारा:

डिप्रेशन का इलाज लाइट थेरेपी के द्वारा भी किया जाता है। इसमें पीड़ित व्यक्ति को लाइट डिवाइस के पास बैठाकर उसके मस्तिष्क पर लाइट मारी जाती है, ताकि उसके मस्तिष्क के अंदरूनी स्थिति की जांच की जा सके।

• एक्सराइज़ के द्वारा:

डिप्रेशन का इलाज एक्सराइज़ के द्वारा भी किया जाता है। इसमें दिमाग संबंधी एक्सराइज़ की जाती है, जिससे मस्तिष्क की क्षमता बढ़ती है।

• नशीले पदार्थों के परहेज के द्वारा:

डॉक्टर डिप्रेशन से पीड़ित लोगों को नशीले पदार्थों से दूर रहने की सलाह देते हैं।

डिप्रेशन से बचने के उपाय क्या हैं ?

डिप्रेशन से बचाव करने के लिए कुछ निम्न उपाय अपना सकते हैं जैसे की-

• डिप्रेशन से दूर रहने के लिए मधुर संगीत सुनना अच्छा तरीका है। लेकिन दुख भरे गाने न सुने।

• डिप्रेशन से बचने के लिए स्लीपिंग पैटर्न को बदलने की जरुरत है और जल्दी सोने व जागने की आदत डालनी चाहिए। सोने से पहले लैपटॉप मोबाईल या टीवी न देखें क्योंकि इससे तनाव उत्पन्न हो सकता है।

• डिप्रेशन से दूर रहने के लिए अपने मन पसंद के कार्य करना चाहिए। इससे तनाव को दूर किया जा सकता हैं।

• धार्मिक पुस्तकें पढ़कर व भजन सुनकर भी मन को शांत किया जा सकता है।

• डिप्रेशन को दूर करने के लिए सुबह शाम टहलना व व्यायाम, योगा करना चाहिए। इससे स्वास्थ्य अच्छा और दिमाग शांत रहता हैं।

• डिप्रेशन को दूर करने के लिए पौष्टिक आहार लेना चाहिए। इसके अलावा दिन में पानी खूब पीना चाहिए।

• कैफीन यानि चाय, कॉफी का सेवन कम करना चाहिए। शराब व धूम्रपान डिप्रेशन को बढ़ावा देते हैं।

शुक्रवार

सुबह की सैर के फायदे? सुबह की सैर कितनी देर करनी चाहिए?

सुबह की सैर

आपने हर तीसरे व्यक्ति से ये कहते हुए सुना होगा कि सुबह की सैर सेहत के लिए बहुत फायदेमंद है। और आज कल के समय में सुबह की सैर के बहुत फायदे हैं और ऐसा इसलिए क्योंकि पहले के समय लोग शौच के लिए बाहर जाते थे, उसी बहाने उनकी सैर भी हो जाती थी।

subah ki sair
Morning Walk

आज के समय में ऑफिस का काम हो या खरीदारी सब कुछ घर बैठे ही हो जाता है। जिसकी वजह से फिजिकल एक्टिविटी भी बहुत कम हो गई है और हृदय रोग, जोड़ों में दर्द, ब्लड प्रेशर की समस्या जैसी ढेरों समस्या होने लगी हैं।

सुबह जल्दी उठकर सैर पर जाने से सुबह की ताजी हवा, शुद्ध वातावरण और सूर्य की किरणों से विटामिन डी मिलता है जो स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा है। ये शरीर के अंदर ताज़गी भर देता है, बीमारियो को दूर करता है और मूड को अच्छा बनाता है। इसलिए अगर आप एक हेल्थी लाइफ स्टाइल चाहते हैं तो सुबह की सैर जरूर करें।

सुबह की सैर क्यों जरूरी है?

सुबह की सैर करने से कई गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है। यह मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रखता है, नींद अच्छी लाने के साथ साथ याददाश्त और सोचने व सीखने की क्षमता को भी बढ़ता है। इसलिए सुबह की सैर को नियमित रूप से करना चाहिए।

सुबह की सैर के लिए क्या क्या चाहिए?

सुबह की सैर के लिए नीचे दी गई चीज़े जरूरी है जैसे:

• स्पोर्ट्स शूज

• शॉर्ट्स या लेगिंग

• टी शर्ट

• स्पोर्ट्स ब्रा (महिलाओं के लिए)

• हेयर बैंड (महिलाओं के लिए)

• वॉटर बॉटल

• फिटबैंड (हार्ट बीट और कदमों को ट्रैक करने के लिए)

सुबह की सैर के फायदे?

1. शरीर से आलस दूर करे:

सुबह की सैर से शरीर का आलस दूर भागता हैं। आलस किसी भी इंसान के लिए अच्छा नहीं होता हैं। इससे शरीर में रोग आने लगते है और दिमाग में भी नए विचार नहीं आ पाते जिससे वे अपने जीवन में कभी भी सफल नहीं हो पाता हैं।

इसलिए जो व्यक्ति सुबह जल्दी उठकर सैर पर जाता है, उसके शरीर में आलस प्रवेश नहीं करता और वह फिट और स्वस्थ रहता हैं।

2. मोटापा दूर करें:

आज के समय में मोटा कोई नहीं होना चाहता। मोटापे के कारण शरीर में कई समस्याएं आने लगती हैं। सुबह की सैर से शरीर में जमा फैट कम होता हैं। कैलोरी बर्न होती हैं, मांसपेशियों में खिंचाव आता हैं जिससे मांसपेशियां मजबूत होती हैं और मोटापा कम होता है।

3. हृदय रोग दूर करें:

अनियमित जीवन शैली और गलत खान पान के कारण हृदय रोग (heart problems) तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में हृदय को स्वस्थ बनाए रखने के लिए सुबह की सैर के फायदे (subah sair karne ke fayde) बहुत मददगार हो सकते हैं। सुबह नियमित 30-50 मिनट वॉक करने और सुबह की ताजी हवा लेने से आप हृदय संबंधित रोगों से दूर रह सकते हैं। अगर आप पहले से ही हृदय संबंधित किसी रोग से जूझ रहें हैं तो आपको नियमित सुबह की सैर पर जरूर जाना चाहिए।

4. डायबिटीज को नियंत्रित रखें:

डायबिटीज एक ऐसी बीमारी हैं जो एक बार हो जाए तो जिंदगीभर ठीक नही होती। इसलिए इस बीमारी से बचने के लिए कुछ देर टहलने जरूर जाना चाहिए।

5. कोलेस्ट्रॉल दूर करने के लिए:

सुबह की सैर शरीर के कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने में मदद करता है। सुबह तेज चलने से शरीर से पसीना निकलता हैं और अधिक मात्रा में कैलोरी खर्च होती है जिससे कोलेस्ट्रॉल कम होता हैं।

6. हड्डियां मजबूत रखने के लिए:

सुबह की सैर से शरीर को विटामिन डी मिलती हैं जो हड्डियों को मजबूत रखने में मदद करता है। इसलिए हड्डियों को मजबूत रखने के लिए कैल्शियम के साथ साथ विटामिन डी भी बहुत जरूरी होती हैं।

7. पेट की समस्याओं को दूर करने के लिए:

गलत खान पान और अनियमित जीवन शैली से पेट में कई तरह की समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं जैसे कब्ज, गैस, एसिडिटी, अपच आदि। पेट से जुड़ी इन समस्याओं को दूर करने के लिए सुबह की सैर बहुत अच्छी है। ये पाचन तंत्र को मजबूत करता हैं जिससे भोजन अच्छी तरह पचता है और पेट स्वस्थ रहता है।

8. तनाव कम करे:

सुबह का शांत वातावरण, हल्की धूप और ताजी हवा मन को शांत रखने में मदद करता हैं और दिमाग में नकरात्मक विचार नहीं आने देता, जिससे तनाव दूर रहता है। इसलिए सुबह की सैर जरूर करनी चाहिए।

9. शरीर में ऊर्जा बढाने के लिए:

जो लोग सुबह तेज तेज वॉक करते हैं उनके शरीर में हमेशा ऊर्जा भरी होती हैं। सुबह की ताजी हवा और ताजी धूप शरीर में ऊर्जा और स्टैमिना बढ़ाने का कार्य करते है और शरीर को एक्टिव रखती है।

10. अच्छी नींद के लिए:


आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोगों को इतना ज्यादा तनाव है जिससे नींद अच्छे से नहीं आ पाती। जो लोग सुबह जल्दी उठकर सैर पर जाते हैं उन्हें अनिद्रा का शिकार नहीं होना पड़ता।

12. त्वचा की शिकार के लिए:

सुबह की सैर करने से चेहरे पर निखार आता हैं और त्वचा लंबे समय तक जवां दिखाई देती हैं। सुबह शरीर को सूरज की किरणों से विटामिन डी प्राप्त होता हैं जो त्वचा के लिए फायदेमंद होता हैं।

13. रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए:

सुबह की सैर से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती हैं। रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होने से शरीर रोगों से दूर रहता हैं। इसलिए सुबह की सैर जरूर करनी चाहिए।

14. दिमाग के लिए:

सुबह की सैर से दिमाग को शुद्ध ऑक्सीजन मिलता हैं और दिमाग तक ब्लड भी अच्छी तरह पहुँचता हैं।जिससे दिमाग तेज होता हैं।

15. गुस्सा शांत करने के लिए:

जिन लोगों को जल्दी और छोटी छोटी बात पर गुस्सा आता हैं उन्हें सुबह की सैर जरूर करनी चाहिए। सुबह वॉक करने से दिमाग और मन को शांति मिलती हैं जिससे गुस्से को नियंत्रित करने में मदद मिलती हैं।

सुबह की सैर के नियम?

अगर आप सुबह की सैर करने की सोच रहे हैं तो आपको मॉर्निंग वॉक के नियम जरूर पता होने चाहिए, जिसकी मदद से आप बिना किसी परेशानी के वॉक कर सकते हैं।

• सुबह की सैर सूरज की हल्की रोशनी में ही करनी चाहिए।

• सुबह की सैर के लिए नींद पूरी होना जरूरी है जिससे सुबह सैर पर फ्रेश मूड के जा सके। और इसके लिए आपको रात को जल्दी सो जाना चाहिए।

• सुबह सैर पर पर जाते समय एक पानी की बोतल साथ रख ले और प्यास लगने पर पानी पीते रहे इससे बॉडी में डिहाइड्रेशन नहीं होगी।

• सैर पर जाने के लिए आरामदायक ढीले कपड़े ही पहनना चाहिए।

• सुबह की सैर के लिए अच्छी क्वालिटी के आरामदायक जूते पहनने चाहिए जिससे पैर दर्द ना करे और आराम से चला जा सके।

• अगर वॉक करते समय कोई समस्या हो रही हो तो जबरदस्ती वॉक न करें।

• वॉक की शुरुआत और अंत धीरे कदमों से करना चाहिए।

• टहलते समय सांस अंदर बाहर लेते और छोड़ते रहना चाहिए।

• अपना पूरा ध्यान वॉक पर ही रखें। मन में कोई अन्य विचार न लाए।

• अगर आपको कोई गंभीर बीमारी हैं तो डॉक्टर की सलाह से ही सुबह वॉक करें।

• पहले दिन ही ज्यादा देर तक वॉक न करें, धीरे धीरे वॉक करने का समय बढाये।

• वॉक करने के तुरंत बाद पानी नहीं पीना चाहिए, तापमान सामान्य होने पर ही पानी पिये।

• सुबह एक दम खाली पेट वॉक नहीं करना चाहिए।

• मॉर्निंग वॉक करने से पहले बहुत ज्यादा भारी भोजन भी न करें।

करने से पहले थोड़ा कुछ खा लें।

15. मॉर्निंग वॉक करने से पहले बहुत ज्यादा भारी भोजन भी न करें।

सुबह की सैर का सही टाइम क्या हैं?

सुबह की सैर करने का सही समय तब होता हैं जब सूरज की किरणें नर्म होती हैं।


सुबह 5 बजे से 7 बजे के बीच सैर करने का समय बिल्कुल सही रहता हैं।


सुबह की सैर कितनी देर करनी चाहिए?

सुबह की सैर अपनी शारीरक क्षमता के अनुसार 30 मिनट से लेकर 60 मिनट तक कर सकते हैं।

ऐसे ही बूढ़े व्यक्तियों को 30-40 मिनट सुबह की सैर करनी चाहिए।

सुबह की सैर से पहले क्या खाना पीना चाहिए?

बहुत सारे लोगों को ये नहीं पता होता ही सुबह कुछ खा के सैर पर जाना चाहिए या नहीं। इसलिए आपको बता दें की सुबह खाली पेट कभी भी मॉर्निंग वॉक पर नही जाना चाहिए।

सुबह की सैर पर जाने से थोड़ी देर पहले सेब, केला, पपीता जैसे फल, फलों का जूस या ब्लैक कॉफी पी सकते हैं, इससे शरीर में एनर्जी रहेगी और सैर करने में आसानी रहेगी।

सुबह की सैर के बाद क्या खाना चाहिए?

सुबह की सैर के बाद पौष्टिक नाश्ता करना चाहिए। इसलिए आप नाश्ते में दलिया, ओट्स, फलों का जूस, अंडा, दूध या फिर फलों ले सकते हैं। मॉर्निंग वॉक के बाद तैलीय भोजन और मैदे से बनी चीज़ नही लेना चाहिए।

गुरुवार

तुलसी क्या है कितने प्रकार की होती है, इसके क्या लाभ हैं।

तुलसी को हिन्दू धर्म में पूज्य माना गया है, जो हर आंगन और घर की छतों में पाया जाता है। इसे सिर्फ पौधे ही नहीं बल्कि घर में भगवान के रूप में माना जाता है। तुलसी में बहुत सारे रोगों से लड़ने की क्षमता होती है इसलिए इसे 'क्वीन ऑफ हर्ब्स' भी कहा जाता है।

Tulasi
Tulsi

आयुर्वेद के हिसाब से तुलसी के पौधे का हर हिस्सा स्वास्थ्य के लिहाज से बहुत फायदेमंद है। तुलसी की जड़, शाखाएं, पत्ती और बीज सभी का अपना महत्व है। तुलसी शरीर के शोधन के साथ-साथ वातावरण का भी शोधन करती है तथा पर्यावरण को संतुलित बनाने में मदद करती है।

आइये जानते हैं तुलसी के गुणों, तुलसी के उपयोग और आयुर्वेदिक महत्व के बारे में।

तुलसी क्या है?

तुलसी एक औषधीय पौधा है जिसमें विटामिन और खनिज पाए जाते हैं। ये रोगों को दूर करने और शारीरिक शक्ति बढ़ाने में मदद करता है इसलिए इससे ज्यादा उपयोगी औषधि और कोई नहीं है। 

तुलसी का पौधा की ऊंचाई 30 से 60 सेमी तक होती है और इसके फूल सफेद और बैगनी रंग के होते हैं। 

तुलसी कितने प्रकार की होती है?

अनमोल पौधे के कुल 5 प्रकार होते हैं, जो स्वास्थ्य से लेकर वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। 

1) श्याम तुलसी
2) राम तुलसी
3) श्वेत/विष्णु तुलसी
4) वन तुलसी
5) नींबू तुलसी 


तुसली के नाम अन्य भाषाओं में?

तुलसी का वानस्पतिक नाम ओसीमम् सेंक्टम् (Ocimum sanctum) और कुल का नाम  लैमिएसी (Lamiaceae) है। अन्य भाषाओं में तुलसी का नाम इस तरह से है-

• Tamil: तुलशी (Tulashi)
• Telugu: गग्गेर चेट्टु (Gagger chettu)
• Sanskrit: तुलसी, सुरसा, देवदुन्दुभि, अपेतराक्षसी, सुलभा, बहुमञ्जरी, गौरी, भूतघ्नी
• Odia: तुलसी (Tulasi)
• Kannad: एरेड तुलसी (Ared tulsi)
• Gujrati: तुलसी (Tulasi)
• Bengali: तुलसी (Tulasi)
• Nepali: तुलसी (Tulasi)
• Marathi: तुलस (Tulas)
• Malyalam: कृष्णतुलसी (Krishantulasi)
• Arabi: दोहश (Dohsh)


तुलसी के फायदे किस तरह है?

औषधीय गुणों की दृष्टि से तुलसी की पत्तियां ज्यादा फायदेमंद मानी जाती है। सभी तुलसी में राम तुलसी और श्याम तुलसी को प्रमुख माना गया है। इनकी पत्तियों को आप ऐसे ही लेकर खा सकते हैं। आइये जानते है तुलसी के फायदों के बारे में-

• दिमाग के लिए:

दिमाग के लिए तुलसी बहुत ही फायदेमंद होती है। इसके सेवन से मस्तिष्क की कार्यक्षमता बढ़ती है और याददाश्त तेज होती है। इसलिए रोज तुलसी की 4-5 पत्तियों को पानी के साथ निगलकर खाना चाहिए।

• सिर दर्द के लिए:

सिरदर्द होना एक आम बात है और अगर कोई इस समस्या से परेशान रहता है तो तुलसी के तेल की एक दो बूंदें नाक में डालना चाहिए। इससे बहुत जल्दी ही सिर दर्द से आराम मिलता है।


• सिर के जूँ और लीख के लिए:

अगर सिर में जुएं पड़ गये हैं और यह ठीक नहीं हो रही है तो बालों में तुलसी का तेल लगाने से जूं और लीखें मर जाती हैं। 

• रतौंधी (Night Blindness) के लिए:

कई लोगों को रात के समय ठीक से दिखाई नहीं पड़ता है, जिसे रतौंधी (Night Blindness) कहा जाता है। रतौंधी से पीड़ित लोगों के लिए तुलसी की पत्तियां काफी फायदेमंद होती है।

• साइनसाइटिस के लिए:

अगर आप साइनसाइटिस के मरीज हैं तो तुलसी की पत्तियां मसलकर सूघें। इन पत्तियों को सूंघने से साइनसाइटिस रोग जल्दी ठीक होता है।

• कान के दर्द और सूजन के लिए:

कान के दर्द और सूजन के लिए तुलसी के पत्ते काफी असरदार होते है। कान में दर्द होने पर तुलसी के रस को गर्म करके 2-2 बूँद कान में डालने से दर्द से जल्दी आराम मिलता है। 

• दांत दर्द के लिए:

तुलसी की पत्तियां दांत दर्द में भी काम आती हैं। काली मिर्च और तुलसी के पत्तों की गोली बनाकर दांत के नीचे रखने से दांत के दर्द से आराम मिलता है।

• गले में खराश के लिए:

तुलसी की पत्तियां गले से जुड़ी समस्याओं को दूर करने में बहुत ही फायदेमंद हैं। तुलसी के रस को हल्के गुनगुने पानी में मिलाकर कुल्ला करने से आराम मिलता है। 

• खांसी के लिए:

तुलसी की पत्तियों से बने  शर्बत में गर्म पानी मिलाकर लेने से जुकाम में बहुत लाभ मिलता है 

• सूखी खांसी:

तुलसी की पत्तियां अस्थमा और सूखी खांसी से पीड़ित लोगों के लिए भी बहुत गुणकारी हैं। इसके लिए तुलसी की मंजरी, सोंठ, प्याज का रस और शहद को मिला कर मिश्रण बनाएं और चाटकर खाएं, इससे सूखी खांसी में लाभ होता है।

• डायरिया और पेट की मरोड़ के लिए:

गलत खानपान या प्रदूषित पानी की वजह से डायरिया हो जाता हैं। तुलसी की पत्तियां डायरिया, पेट में मरोड़ आदि समस्याओं को ठीक करने में मदद करती हैं। 

• अपच के लिए:

 पाचन शक्ति कमजोर होने पर तुलसी का सेवन करना चाहिए। इसके लिए तुलसी की 2 ग्राम मंजरी को पीसकर काले नामक के साथ दिन में 3 से 4 बार लेना चाहिए।

• पेशाब में जलन के लिए:

पेशाब में जलन होने पर भी तुलसी के बीज का उपयोग करने से आराम मिलता है। 

• पीलिया के लिए:

पीलिया एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज सही समय पर ना करवाने से यह आगे चलकर गंभीर बीमारी बन जाती है। तुलसी  के पत्तों को पीसकर छाछ के साथ मिलाकर पीने से पीलिया ठीक होता है।

• पथरी दूर करने के लिए:

पथरी होने पर तुलसी का सेवन करना फायदेमंद रहता है। इसके लिए तुलसी की पत्तियों को पीसकर शहद के साथ खाएं। यह पथरी को बाहर निकालने में मदद करता है। 

• डिलीवरी के बाद होने वाले दर्द से आराम के लिए:

डिलीवरी के बाद महिलाओं को तेज दर्द होता है और इस दर्द को दूर करने में तुलसी (Tulsi plant) की पत्तियां फायदेमद रहती हैं। 

• कुष्ठ रोग के लिए:
 तुलसी का सेवन कुष्ठ रोग को दूर करने में सहायक है। 


• रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए:

तुलसी के नियमित सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है जिससे सर्दी-जुकाम और अन्य संक्रामक बीमारियों से बचाव होता है। 

• मलेरिया के लिए:

तुलसी का पौधा मलेरिया प्रतिरोधी है। तुलसी के पौधों को छूने से मलेरिया के मच्छर वहां से भाग जाते हैं, 

• पीरियड्स की अनियमितता के लिए:

शरीर में वात दोष बढ़ जाने से पीरियड्स अनियमित हो जाते है | तुलसी के बीज में वात को नियंत्रित करने का गुण होता है जिससे पीरियोड्स ठीक से आने लगता है।

• साँसों की दुर्गंध दूर करने के लिए:

साँसों में दुर्गन्ध, पाचन शक्ति कमजोर होने के कारण होती है | 

• चोट ठीक करने के लिए:

चोट लगने पर भी तुलसी का उपयोग किया जाता है क्योंकि इसमें रोपण और सूजन को कम करने वाला गुण होता है। तुलसी का यही गुण चोट के घाव एवं उसकी सूजन को भी  ठीक करने में सहायक होता है |

• चेहरे के निखार के लिए:

तुलसी का उपयोग चेहरे की निखार वापस लाने के लिए भी किया जाता है।

• सांप काटने पर:

5-10 मिली तुलसी-पत्र-स्वरस को पिलाने से तथा इसकी मंजरी और जड़ों को पीसकर सांप के काटने वाली जगह पर लेप लगाने से लाभ मिलता है।.

शनिवार

स्तनपान से शिशु को मिलने वाले लाभ। स्तनपान से मां को मिलने वाले लाभ, स्तनपान कराने वाली माँ के लिए जरूरी आहार?

Breast feeding

मां का दूध बच्चे के लिए अमृत समान होता है, जिससे बच्चे को रोगों से लड़ने की क्षमता मिलती है और वह स्‍वस्‍थ रहता है।

breast feeding
Breast Feeding


जन्म के बाद से ही बच्चे के लिए मां का दूध बहुत जरूरी होता है और मां के दूध से ही उन्हें सभी पोषण भी मिलता है। डॉक्टर्स भी बच्चों को 6 महीने तक दूध पिलाने की सलाह देते हैं जिससे बच्चे के शरीर में शक्ति पहुंच सके। लेकिन क्या आप जानते हैं कि स्तनपान जितना बच्चे के लिए जरूरी और फायदेमंद होता है, उतना ही फायदेमंद मां के लिए भी होता है।

स्तनपान से शिशु को मिलने वाले लाभ

• स्तनपान में मौजूद प्रोटीन, विटामिन, कैल्शियम आदि शिशु के शारीरिक विकास में मदद करता है।
• स्तनपान में उच्च प्रोटीन और रोगप्रतिकारक तत्व मौजूद होते हैं जो शिशु की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।
• स्तनपान करने वाले बच्चों को जुकाम, सांस संबंधी इन्फेक्शन, कान में संक्रमण और इन्फ्लूएंजा जैसे रोग नही होते हैं।

• स्तनपान में प्रोबायोटिक होता है जो बच्चो के पाचन क्रिया मज़बूत होती है। इसलिए जिन बच्चों को स्तनपान कराया जाता है, वे दूसरे बच्चों से ज्यादा स्वस्थ रहते हैं। 

• स्तनपान से बच्चो में डायबिटीज होने का खतरा कम हो जाता है। 

• स्तनपान करने वाले शिशुओं में हाई ब्लड प्रैशर, हाई कोलेस्ट्रॉल और बड़े होकर हृदय रोग होने की संभावना कम होती है।

• स्तनपान करने वाले शिशुओं में कैंसर के लक्षण कम होते हैं और बच्चियों में बड़े होकर स्तन और ओवरी के कैंसर होने की संभावना भी कम होती है।

• स्तनपान करने वाले बच्चे कम बीमार पड़ते हैं।

• स्तनपान करने वाला बच्चा कम बीमार होता है, और जल्दी ठीक हो जाता है।

• स्तन के दूध में फैट लेवल हाई होता हैं जो मस्तिष्क और नर्वस सिस्टम के लिए बहुत जरूरी है।

• स्तनपान करने वाले बच्चों में आईक्यू अच्छा होता है, बेहतर विकसित न्यूरोलॉजिकल सिस्टम और तेज दृष्टि होती है।

• स्तनपान सडन इन्फेंट डेथ सिंड्रोम के खतरे को कम करता है।

स्तनपान से मां को मिलने वाले लाभ

• स्तनपान कराने से गर्भाशय को जल्दी ही सिकुड़ कर पहले की स्थिति में आने में मदद मिलती है।

• स्तनपान करने से लगाव बढ़ता है। जब एक माँ अपने बच्चे का पालन-पोषण करती है, तो वह दूध के साथ साथ हार्मोन ऑक्सीटोसिन छोड़ती है। यह बच्चे से लगाव भी बढ़ाता है। जिसे "मदरिंग" हार्मोन भी कहा जाता है।

• ऑक्सीटोसिन हार्मोन तनाव को नियंत्रित करता है।

• स्तनपान से स्तन और ओवरी के कैंसर का खतरा कम होता है। 

• स्तनपान से ऑस्टियोपोरोसिस ( हड्डियां कमज़ोर होना) का खतरा कम होता है। 

• बच्चे के लिए दूध बनाने के लिए एक दिन में लगभग 500 कैलोरी की आवश्यकता होती है इसलिए स्तनपान कराने से वजन कम करने में मदद मिलती है।।

• स्तनपान मेटाबॉलिक सिंड्रोम जैसे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रैशर, हाई कोलेस्ट्रॉल और हृदय रोग के खतरे को कम करता है। 

• पहले छह महीनों में स्तनपान कराने से ओवुलेशन देरी से शुरू होता है जिससे गर्भाधारन की संभावना कम हो जाती है।

• स्तनपान कराने से नींद में सुधार होता है। इससे वो ज्यादा जल्दी सो जाती हैं और अच्छी गहरी नींद लेती हैं।

• स्तनपान से हार्मोन का संतुलन बना रहता है, जिससे कील-महुांसों का खतरा भी कम हो जाता है। 

• स्तनपान से समय की भी बचत होती है, और पूरी तरह सुरक्षित और आसानी से उपलब्ध है ।

• स्तनपान कराने से चिंता, तनाव और डिप्रैशन बहुत कम होता है।

स्तनपान कराने वाली माँ के लिए जरूरी आहार?

1. जई का दलिया (ओटमील)- जई का दलिया, कैल्शियम और आयरन का अच्छा स्रोत है जो दूध को बढ़ाने में मदद करता है।

2. शतावरी- शतावरी के सेवन से दूध की मात्रा में वृद्धि होती है।

3. ब्राऊन राइस- यह उच्च फाइबर और पोषक तत्वों से भरपूर होता है जो स्तनपान हॉर्मोन्स को बढ़ाता है।

4. बादाम- बादाम मे मौजूद विटामिन ई और omega-3 लैक्टेशन हॉर्मोन्स को बढ़ाने में मदद करते हैं।

5. मेथी- मेथी में omega-3, आयरन अधिक मात्रा में  पाया जाता है, जो दूध की वृद्धि के लिए जरूरी है।

6. सौंफ का पानी- इसके सेवन से लैक्टेशन हॉर्मोन बढ़ जाते हैं।

7. पपीता- पपीता ऑक्सिटोसिन उत्पादन में वृद्धि करता है, जिससे माँ के दूध में वृद्धि होती है।

8. लहसुन -लहसुन से दूध उत्पादन की क्षमता बढ़ती है।

9. कद्दू बीज- कद्दू के बीज में डी.एच.ए. और अल्फा लिनोलेनिक एसिड के स्रोत पाए जाते हैं, जो स्तनपान कराने वाली माताओं में दूध को बढ़ाता हैं।

10. नारियल पानी- नारियल पानी में पोटैशियम, कैल्शियम पाया जाता है जो माँ का दूध बढ़ाने में मदद करता है।

11. गाजर- गाजर विटामिन ए का स्रोत है जो शिशु के स्वस्थ विकास के लिए बहुत जरूरी है।

12. सैल्मन मछली- यह डी.एच.ए.और ओमेगा-3का बहुत अच्छा स्रोत है जो शिशु के मस्तिष्क के विकास के लिए जरूरी है।

13. हरी पत्तेदार सब्जियां- हरी सब्जियों में विटामिन के साथ साथ फोलेट, कैल्शियम जैसे खनिज पाए जाते हैं जो दूध की गुणवत्ता को बढ़ाने में मदद करते हैं।

14. तुलसी की पत्तियां- तुलसी के पत्ते में नियासिन, विटामिन के, कैरोटीन और थियामिन , एंटीऑक्सीडेंट गुण उचित मात्रा में होते हैं। ये भी दूध की गुणवत्ता को बढ़ाने में मदद करते हैं।

15. दही- दही, स्तनपान कराने वाली मां के शरीर में प्रोटीन, कैल्शियम, पोटैशियम ,विटामिन-बी-12 को बनाये रखने में मदद करता है।

16. हल्दी- हल्दी में एंटीवायरल, एन्टी इंफ्लामेटरी गुण पाए जाते हैं जो स्तन संक्रमण के खतरे को कम करता है।

17. लौकी- लौकी शरीर को हाइड्रेटेड रखने में मदद करती है।

18. दालें- दालें प्रोटीन और फाइबर का अच्छा स्रोत होती हैं जो दूध को बढ़ाती हैं।

19. पालक- पालक मे मौजूद लौह तत्व और एंटीऑक्सीडेंट, बच्चे की प्रतिरक्षा बढ़ाने में मदद करता है।

20. अदरक- अदरक में मौजूद औषधीय गुण, स्तनपान कराने वाली माताओं के दूध उत्पादन क्षमता में वृद्धि करता है।

रविवार

कैल्शियम की कमी क्या है? कैल्शियम की कमी के लक्षण क्या हैं? कैल्शियम की कमी की पहचान कैसे करें?

कैल्सियम हमारे शरीर के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। कैल्शियम, हड्डियों को मजबूत बनाने, नसों, ब्लड, मांसपेशियों और दिल की कमजोरी दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हमारे शरीर की हड्डियों और दांतो में 99% कैल्शियम होता है और 1% खून और मांसपेशियों में होता है। इसलिए अगर शरीर में कैल्शियम की कमी हो जाए तो बोन्स कमज़ोर होने लगते हैं, इसके अलावा और कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ जाता है।


महिलाओं में कैल्शियम की कमी सबसे ज्यादा होती है। जो महिलाएं बच्चे को दूध पिलाती है और जिन महिलाओं को उम्र 40 के पार हो जाती है, उन महिलाओं में अक्सर कैल्शियम की कमी होने लगती है, इसलिए उन महिलाओं को खाने पीने का खास ख्याल रखने की जरूरत है।

कैल्शियम की कमी क्या है?


कैल्शियम की कमी को हाइपोकाल्सीमिय (Hypocalcemia) भी कहते है। ये एक ऐसी स्थिति होती है, जब खून में कैल्शियम की कमी हो जाती है।
वैसे तो इसका इलाज संभव है, अगर काफी लंबे समय तक इसका इलाज न करवाया जाए तो इसका असर शरीर के अन्य अंगों जैसे दाँत, आंख, मस्तिष्क इत्यादि पर पडने लगता है।

कैल्शियम की कमी के लक्षण क्या हैं?

किसी भी दूसरी बीमारी की तरह कैल्शियम की कमी के भी लक्षण होते हैं जिसका समय रहते अगर पता चल जाए तो इसको बढ़ने से रोका जा सकता है। ऐसे ही कुछ संकेत नीचे दिए हुए हैं-

• उंगलियों में झुनझुनाहट लगना- कैल्शियम की कमी होने पर उंगलियों में झुनझुनी होने लगती है।
ऐसी स्थिति में डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए, ताकि इसको रोका जा सके।

• मांसपेशियों में ऐंठन लगना- कैल्शियम की कमी होने पर मांसपेशियों में ऐंठन होने लगती है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।

• थकावट लगना- किसी काम को करने के बाद थकावट होना आम चीज़ है, लेकिन थोड़ा सा काम करने पर भी थकान ज्यादा लगे, तो ऐसे में हेल्थचेकअप कराना जरूरी हो जाता है।

• भूख न लगना- कैल्शियम की कमी होने पर भूख कम लगने लगती है। इसलिए ऐसा होने पर डॉक्टर को दिखाना चाहिए।

• नाखुन कमजोर होना- जिन लोगों के नाखुन कमज़ोर हो जाते हैं और टूटने लगते हैं, वो सब कैल्शियम की कमी होने का लक्षण है।

• निगलने में कठिनाई होना- निगलने में कठिनाई होने को गले में खराश या फिर जुखाम का संकेत माना जाता है, लेकिन कई बार यह कैल्शियम की कमी होने से भी हो सकता है।

कैल्शियम की कमी के कारण क्या है?

कैल्शियम की कमी होने के बहुत सारे कारण होते हैं, जो नीचे दिए हुए हैं-

• खून में प्रोटीन का कम होना- कैल्शियम की कमी होने का प्रमुख कारण खून में प्रोटीन का कम होना है।
और ऐसा तब होता है, जब शरीर को ठीक से प्रोटीन नहीं मिल पाता है।

• भोजन का ठीक से न करना- अगर इस भागदौड़ भरी ज़िदगी में अच्छी तरह से भोजन नही किया जाए तो कैल्शियम की कमी का कारण बन सकता है।

• दवाइयों का साइड इफेक्ट्स होना- कैल्शियम की कमी तब भी होती है, जब दवाइयों का साइड-इफेक्ट्स हो जाता है।

• हार्मोन का बदलना- यदि किसी व्यक्ति में हार्मोन का असामान्य तरीके से बदलाव हो रहा है, तो उसे कैल्शियम की कमी कारण कह सकते हैं।

• जेनेटिक कारण- कैल्शियम की कमी की समस्या जेनेटिक भी होता है अगर परिवार में किसी अन्य सदस्य को ये बीमारी है तो दूसरो को भी इसके कारण हो सकता है।

कितने कैल्शियम की जरूरत होती है?

• बढ़ती उम्र के बच्चों को रोज 500-700 मिलीग्राम कैल्शियम लेना जरूरी होता है।

• युवाओं को रोज 700-1,000 मिलीग्राम कैल्शियम लेना जरूरी होता है।

• प्रेग्नेंट महिलाओं को रोज 1,000 से 1200 मिलीग्राम कैल्शियम लेना जरूरी होता है।

• दूध पिलाने वाली महिलाओं को रोज 2,000 मिलीग्राम कैल्शियम लेना जरूरी होता है।

कैल्शियम की कमी की पहचान कैसे करें?

• मेडिकल हिस्ट्री द्वारा- कैल्शियम की कमी की पहचान मेडिकल हिस्ट्री द्वारा की जा सकती है। इसमें इस बात का पता लगाया जाता है कि अतीत में कैल्शियम संबंधी कोई बीमारी थी या नहीं।

• ब्लड टेस्ट द्वारा- कैल्शियम की कमी की पहचान ब्लड टेस्ट के द्वारा भी लगाई जाती है। ऐसे इस बात का पता चलता है कि शरीर में कैल्शियम की मात्रा कितनी है।

• एल्युबिन टेस्ट द्वारा- कैल्शियम की कमी की पहचान एल्युबिन टेस्ट से भी की जाती है।

• हड्डियों की जांच द्वारा- कैल्शियम की कमी की पहचान हड्डियों की जांच करके भी किया जाता है।

कैल्शियम की कमी का इलाज कैसे किया जाता है?

• खान पान में बदलाव करके- डॉक्टर कैल्शियम की कमी से पीड़ित लोगों को दही, चीज़ आदि खाने की सलाह देते हैं, जिससे कि शरीर में कैल्शियम की कमी दूर हो सके।

• एक्सराइज़ करके- कैल्शियम की कमी से पीड़ित लोगों को चलना, दौड़ना, जॉगिंग आदि एक्सराइज़ करना चाहिए ताकि उनके शरीर में कैल्शियम की कमी दूर हो सके।

• कैल्शियम के सप्लीमेंट द्वारा- कैल्शियम के ऐसे बहुत सारे सप्लीमेंट होते हैं, जिनने द्वारा कैल्शियम की कमी को दूर किया जा सकता है।

• कैल्शियम के इंजेक्शन द्वारा- कैल्शियम की कमी को इंजेक्शनों के द्वारा भी दूर किया जा सकता है।

• कैल्शियम की दवाई द्वारा- कैल्शियम की कमी को दूर करने के लिए डॉक्टर कैल्शियम की दवाई भी देते हैं।

कैल्शियम की कमी से बचाव कैसे कर सकते है?

• हेल्थी डाइट अपनाकर- हेल्थी डाइट अपनाना कैल्शियम की कमी से बचाव किया जा सकता है।
इसके लिए दूध, हरी सब्ज़ियाँ, दही इत्यादि का सेवन करना चाहिए।

• एक्सराइज़ करके- अगर कोई व्यक्ति रोज़ एक्सराइज़ करता है, तो उससे कैल्शियम की कमी कम हो जाती है।

• पर्याप्त नींद लेकर- सभी लोगों को 6 से 8 घंटे की नींद लेनी चाहिए। इससे भी कैल्शियम की कमी को रोका जा सकता है।

• हेल्थचेकअप करा कर- सभी लोगों के लिए समय-समय पर हेल्थचेकअप कराना काफी जरूरी होता है। जिससे इस बात का पता चल जाता है कि कैल्शियम की कमी है या नहीं।

• डॉक्टर के संपर्क में रहकर- अगर किसी व्यक्ति का कैल्शियम की कमी का इलाज चल रहा है, तो डॉक्टर के संपर्क में बने रहना चाहिए।

कैल्शियम की कमी से होने वाले रोग कौन-से हैं?

• दाँतों में बदलाव होना- कैल्शियम की कमी से दाँतों की संरचना में बदलाव होने लगता है।
इसकी वजह से दाँतों की कई अन्य समस्याएं जैसे दाँतों में दर्द होना, मसूड़ों से खून आना इत्यादि हो सकते हैं।

• मोतियाबिंद होना- अक्सर, कैल्शियम की कमी मोतियाबिंद का कारण भी बन सकती है। हालांकि,मोतियाबिंद का इलाज संभव है।
लेकिन यदि यह लंबे समय तक लाइलाज रहे तो इसकी वजह से आंखों की रोशनी भी जा सकती है।

• मस्तिष्क में बदलाव होना- कैल्शियम की कमी के कारण लोगों के मस्तिष्क पर भी असर पड़ता है।
जिसमें मस्तिष्क संबंधी काफी सारी समस्याएं जैसे चीज़ों को भूलना, सिरदर्द होना इत्यादि का सामना करना पड़ता है।

• हड्डियों का कमज़ोर होना- जब किसी व्यक्ति के शरीर में कैल्शियम की कमी हो जाती है, तो उसकी हड्डियां कमज़ोर हो जाती हैं।

• ऑस्टियोपोरोसिस होना- कैल्शियम की कमी से ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis) भी हो जाता है।ये एक ऐसी बीमारी है, जिससे फ्रेक्चर या चोट लगने की संभावना काफी ज्यादा बढ़ जाती है।

कैल्शियम की कमी दूर करने वाले स्त्रोत क्या हैं?

• आंवला- आंवला में भरपूर मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है। यह शरीर की इम्‍यूनिटी पावर को बढ़ाता है। इसके अलावा इसमें एंटीऑक्सीडेंट के गुण भी पाए जाते हैं, जो शरीर को इंफेक्शन से बचाने में मदद करता है।

• कीवी- कीवी में भरपूर मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है। इसमें विटामिन सी भी पाया जाता है, जिससे कैल्शियम की कमी दूर हो जाती है।

• संतरा- संतरों में भी कैल्शियम और विटामिन सी भी पाया जाता है जो कैल्शियम की कमी दूर करने में मदद करता है।

• ड्राइ फ्रूट्स- मुनक्का, किशमिश, बादाम, पिस्ता, अखरोट, तरबूज के बीज में कैल्शियम पाया जाता है। इसके अलावा अजवाइन, जीरा, हींग, लौंग, धनिया, काली मिर्च में भी कैल्शयिम होता है।

• हरी सब्जियां- हरी सब्जियों में भरपूर मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है। इसलिए पत्ता गोभी, अरबी के पत्ते, मेथी, मूली के पत्ते, पुदीना, धनिया, ककड़ी, सेम, ग्वारफली, गाजर, भिंडी को अपनी डाइट में जरूर शामिल करना चाहिए।

• दूध से बनी चीजें- दूध कैल्शियम का अच्‍छा स्रोत है। इसके अलावा दूध से बने पदार्थ, जैसे दही, छाछ, मक्खन, घी, पनीर, चीज आदि में भी कैल्शि‍यम पाया जाता है।

बुधवार

फैटी लिवर क्या है, ये क्यों होता है। इसके लक्षण क्या हैं, इसका उपचार क्या है।

लीवर हमारे शरीर का बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है जिसमें फैटी लिवर की समस्या बहुत तेज़ी से फैल रही है। भारत में लगभग 70 मिलियन युवा इस समस्या से ग्रसित है।


फैटी लिवर की समस्या इतनी तेज़ी से फैल रही है को  हर साल 19 अप्रैल को विश्व फैटी लिवर दिवस (World Fatty Liver Day) मनाया जाता है। ताकि इस लीवर की बीमारी के प्रति  लोग जागरूक रहें, ताकि वे इसका सामना समझदारी से कर सकें। इसके अलावा सावधानी रखें और इसका सामना समझदारी से करें।

क्या है फैटी लीवर?

लीवर का काम होता है भोजन और वेस्ट मैटेरियल को प्रोसेस करना। एक स्वस्थ लीवर में फैट बहुत कम होता है। लेकिन जब लीवर में फैट ज्यादा जमा होने लगता है तो इसका सेहत पर बुरा असर पड़ने लगता है और फैटी लीवर की शिकायत होने लगती है।

लीवर हमारे शरीर का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण अंग है। लीवर शरीर में भोजन पचाने,पित्त बनाने, शरीर को संक्रमण से लड़ने, ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने, विषैले पदार्थो को निकालने, फैट को कम करने तथा प्रोटीन बनाने जैसे जरूरी काम करता है। इसलिए बहुत ज्यादा खाने, शराब पीने या फैट वाला भोजन करने से फैटी लिवर होने की संभावना होती है। 

फैटी लीवर कितने प्रकार के होते हैं?

1. अल्कोहलिक फैटी लीवर (Alcoholic Fatty Liver):

जो व्यक्ति बहुत ज्यादा शराब पीते हैं उससे लीवर को नुकसान पहुंचने लगता है और लिवर फैट को तोड़ नहीं पाता है। जिसे अल्कोहलिक फैटी लीवर कहते हैं। इसमें लीवर में सूजन आ जाती है और लिवर खराब हो सकता है।

2. नॉन- एल्कोहलिक फैटी लिवर (Non-Alcoholic fatty liver):

ज्यादा फैटी भोजन, खराब जीवनशैली, मोटापे और डायबिटीज की वजह से नॉन एल्कोहलिक फैटी लिवर हो सकता है। इसमें लीवर को फैट को तोड़ने में परेशानी होती है और लीवर के टिश्यू में फैट जमने लगता है।

फैटी लीवर के कितने ग्रेड होते हैं?

फैटी लीवर के 4 ग्रेड होते हैं और इसका ग्रेड पता लगाने के लिए अल्ट्रासाउंड किया जाता है जिससे डॉक्टर ये पहचानते है की लीवर कितना डैमेज हुआ है।

1. स्टीटोसिस (Steatosis)- यह सबसे सामान्य और शुरुआती चरण होता हैं, जिसे सिम्पल फैटी लिवर (simple fatty liver) के नाम से भी जाना जाता है। इसमें लीवर में फैट का जमना शुरू हो जाता है लेकिन इसमें सूजन नहीं होती। जिसकी वजह से इसके लक्षण दिखाई नहीं देते और अच्छे खानपान के सेवन से यह ठीक भी हो जाता है।

2. स्टीटोहेपेटाइटिस (Steatohepatitis)- यह एक गंभीर चरण है, जिसे नॉन अल्कोहलिक स्टीटोहेपटाइटिस (Non- Alcoholic steatohepatitis) के नाम से भी जाना जाता है। इसमें लिवर में सूजन आना शुरू हो जाती है, तब वह खराब टिशु को ठीक करने की कोशिश करते है।  जितने ज्यादा टिशु खराब होते है, लिवर उतनी ही तेजी से उनको ठीक करने की कोशिश करने लगता है, जिसकी वजह सूजन वाले टिशुओं में घाव हो जाते है। 

3. फाइब्रोसिस (Fibrosis)- जब लीवर में सूजन के कारण लीवर और उसके आस-पास ब्लड वेसल्स के  टिशू का बनना शुरू होता है, लेकिन फिर भी वो ठीक से कार्य करता रहता है, तो फाइब्रोसिस (fibrosis) कहते है।

4. सिरोसिस (cirrhosis)- यह फैटी लिवर का सबसे खतरनाक चरण होता है, जिसमें लिवर सिकुड़ जाता है और खराब हो जाता है। इसमें त्वचा और आँखों में पीलापन जैसे लक्षण दिखाई देने लगते है और लीवर के टिश्यू में घाव होने लगता है जिनको हटाना मुश्किल हो जाता है। 

फैटी लीवर के कारण क्या हैं?

इस बीमारी के कई सारे कारण हैं जो इस प्रकार हैं-

• वजन अधिक होना- जिन लोगों का वजन अधिक होता है, उनमें लीवर की बीमारी होने की संभावना ज्यादा होती है। इसलिए वजन ज्यादा नहीं बढ़ने देना चाहिए।

• खून में फैट की मात्रा अधिक होना- अगर किसी व्यक्ति के खून में फैट की मात्रा अधिक होती है उनमें फैटी लीवर की दिक्कत होने लगती है। इसी वजह से ऐसी चीजें नहीं खानी चाहिए, जिनमें फैट की मात्रा अधिक होती है।

• हाई ब्लड प्रेशर होना- जिन लोगों में हाई ब्लड प्रेशर की समस्या होती है, उन लोगों में फैटी लीवर की संभावना भी ज्यादा रहती है।

• डायबिटीज होना- यदि कोई व्यक्ति डायबिटीज का मरीज है तो उसे फैटी लिवर की बीमारी हो सकती है।इसलिए उस व्यक्ति को डायबिटीज को नियंत्रित करने की कोशिश करनी चाहिए।

•  ब्लड शुगर लेवल ज्यादा होना- फैटी लीवर की बीमारी उन लोगों को अधिक होती है, जिनका ब्लड शुगर लेवल अधिक होता है।

फैटी लिवर के लक्षण क्या होते हैं?

फैटी लीवर की शुरुआत में इसके लक्षण दिखाई नही देते हैं लेकिन जैसे जैसे ये बढ़ने लगता है, इसके लक्षण भी समझ में आने लगते है। ऐसे ही कुछ लक्षण नीचे दिए हुए हैं-

• त्वचा और आंखों में पीलापन- कई बार लिवर में फैट इतना ज्यादा जमा होने लगता है, की उस व्यक्ति की त्वचा और आंखों का रंग पीला पड़ जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को अपनी जांच करानी चाहिए ताकि इस बात का पता चल सके कि उसे फैटी लिवर की समस्या है की नही।

• हथेलियों का लाल पड़ना- फैटी लिवर होने पर लोगों की हथेलियों में भी बदलाव आने लगता है और उसका रंग लाल हो जाता है। इसलिए अगर इस तरह का परिवर्तन नज़र आता है, तो इसकी जांच करानी चाहिए।

•  पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द होना- फैटी लीवर होने पर व्यक्ति के पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द होता है। इस स्थिति में डॉक्टर से जांच करानी चाहिए, जिसके लिए डॉक्टर दवा भी दे सकते है।

• पेट पर सूजन होना- कुछ लोगों को पेट में दर्द होने के साथ-साथ सूजन भी होने लगती है। इसी कारण पेट पर सूजन होने पर, इसकी सूचना डॉक्टर को देनी चाहिए।

• वजन कम होना- यदि किसी व्यक्ति का वजन काफी तेज़ी से कम होता है, तो उसे इसकी जांच डॉक्टर से करानी चाहिए क्योंकि यह फैटी लिवर का लक्षण हो सकता है।

फैटी लिवर से बचाव कैसे करें?

अगर कोई व्यक्ति इस लिवर की बीमारी की रोकथाम करना चाहता है, तो उसे निम्नलिखित तरीकों को अपनाना चाहिए-

• हेल्थी डाइट अपना कर- फैटी लिवर की रोकथाम हेल्थी डाइट लेकर किया जा सकता है। इसके लिए व्यक्ति को अपने खाने में ताजे फल एवं सब्जियों को शामिल करना चाहिए।

• नियमित व्यायाम करके-  किसी व्यक्ति को सेहतमंद रहने के लिए नियमित रूप से व्यायाम करना चाहिए। इसके लिए उसे रोज 30 मिन व्यायाम जरूर करना चाहिए।

• ध्रूमपान से परहेज करके- व्यक्ति को ध्रूमपान नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे उसकी सेहत पर बुरा असर पड़ता है।

• शराब से दूरी बनाए रख कर- शराब का सेवन लिवर के बहुत बुरा होता है इसलिए फैटी लिवर से पीड़ित व्यक्ति को शराब से दूर रहना चाहिए।

• वजन नियंत्रित रख कर- अधिक वजन के कारण भी फैटी लीवर होने की संभावना ज्यादा रहती है इसलिए वजन को नियंत्रित करके इसकी रोकथाम की जा सकती है।

• डायबिटीज नियंत्रित रख कर- डायबिटीज के कारण भी लिवर में फैट जमा होने लगता है। इसलिए अगर किसी व्यक्ति को डायबिटीज है, तो उसे डायबिटीज को नियंत्रित करने की कोशिश करनी चाहिए।

फैटी लिवर के क्या जोखिम हो सकते हैं?

फैटी लिवर को नज़रअदाज़ नहीं करना चाहिए और सही समय पर इलाज शुरू कर देना चाहिए क्योंकि इलाज न करवाने पर लिवर की बीमारी घातक रूप ले सकती है और उसे कुछ जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है, जिनमें से 5 जोखिम इस प्रकार हैं-

• पेट में तरल प्रदार्थ बनना– यदि फैटी लिवर का इलाज सही समय पर नहीं कराया जाए, तो ऐसे में पेट में तरल प्रदार्थ बनने लगता है, जिसे अस्किट्स (ascites) के नाम से जाना जाता है।

• खाने की नली की नसों में सूजन होना- इस बीमारी का इलाज न कराया जाए तो खाने की नली की नसों में सूजन हो सकती है।

• लिवर कैंसर होना- अगर लिवर की बीमारी अधिक समय तक बनी रहे तो ये कैंसर का रूप ले सकती है।

• लिवर खराब होना- कई बार लिवर में फैट के जमा होने के कारण लिवर की कार्यक्षमता पूरी तरह से खराब हो जाती है जिसकी वजह से लिवर खराब (Liver Failure) भी हो जाता है।

• सिरोसिस होना- फैटी लिवर के लाइलाज रहने पर इससे पीड़ित व्यक्ति को लिवर सिरोसिस की समस्या हो सकती है।

फैटी लिवर का इलाज कैसे किया जा सकता है? 

यदि कोई व्यक्ति फैटी लिवर की समस्या से पीड़ित हैं, तो  इसका इलाज निम्नलिखित तरीकों से माध्यम से कर सकते हैं-

• देसी इलाज करके- लिवर की बीमारी में देसी इलाज करके इसे बहुत जल्दी ठीक किया जा सकता है। इसके लिए सिरके, नींबू, हल्दी, पपीते इत्यादि का सेवन कर सकते है।

• ग्रीन टी पी करके- फैटी लिवर का इलाज ग्रीन टी  से भी किया जा सकता है। ग्रीन टी लिवर के कार्य में सुधार करती है, इसलिए इसके सेवन से फैटी लिवर से छुटकारा पाया जा सकता है।

• आयुर्वेदिक इलाज को अपना करके- फैटी लीवर की बीमारी आयुर्वेदिक तरीके से भी की जा सकता है। इसलिए इस समस्या से पीड़ित व्यक्ति आयुर्वेदिक तरीके का भी सहारा ले सकता है।

• होम्योपैथिक इलाज करके- चूंकि, होम्योपैथिक के साइड- इफेक्ट बहुत कम होते हैं, इसलिए फैटी लीवर का इलाज इससे किया जा सकता है।

• योगा करके-  योगा में ऐसे बहुत सारे योगासान हैं, जो लिवर की कार्यक्षमता को सुधारने में मदद करते हैं।

• लिवर ट्रांसप्लांट करके- अगर किसी भी अन्य तरीके से लीवर में लाभ नहीं मिलता है, तो फिर डॉक्टर उसे लिवर ट्रांसप्लांट कराने की सलाह देते हैं। 

फैटी लीवर के इलाज के दौरान कैसा खानपान और जीवनशैली होनी चाहिए?

• ताजे फल एवं सब्जियों को खाना चाहिए

• फाइबर युक्त आहार का सेवन करें, जैसे फलियाँ और साबुत अनाज।

• अधिक नमक, ट्रांसफैट, रिफाइन्ड कार्बोहाइड्रेट्स और सफेद चीनी का प्रयोग न करें।

• शराब का सेवन बिल्कुल न करें।

• भोजन में लहसुन को शामिल करें  यह फैट जमा होने से रोकता है।

• ग्रीन टी का सेवन करें। 

• तले-भुने एवं जंक फूड का सेवन न करें।

• हरी सब्जियां का सेवन ज्यादा करें जैसे पालक,ब्रोक्ली, करेला, लौकी, टिण्डा, तोरी, गाजर, चुकंदर, प्याज, अदरक तथा अंकुरित अनाज खाएँ।

• राजमा, सफेद चना, काली दाल का सेवन कम कर दे और हरी मूंग दाल, मसूर दाल का सेवन करें।

• मक्खन, मेयोनीज, चिप्स, केक, पिज्जा, मिठाई, चीनी आदि का बिल्कुल भी उपयोग न करे।

• नियमित रूप से प्राणायाम करें तथा सुबह टहलने जाएँ।

कब्ज क्या है इसके लक्षण क्या हैं इसका इलाज क्या है। कब्ज क्यों होता है। इससे क्या क्या नुकसान है।

आजकल के खानपानन और जीवनशैली के कारण कब्ज एक बहुत ही आम समस्या हो गई है, जो ज्यादातर लोगों में पाई ही जाती है। कब्ज को अंग्रेजी में constipation भी कहते हैं। कब्ज एक ऐसी बीमारी है जिसमें मल पेट में ही जमा होता रहता है और जब मल का त्याग ठीक से नही निकल पाता है तो पेट में भारीपन महसूस होता है। जिसकी वजह से गैस, एसिडिटी, पेट में भारीपन, सर दर्द, जैसी परेशानियां होने लगती है। लेकिन ऐसा नहीं की इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। 


इसलिए कब्ज से जुड़ी सभी जानकारियां होना जरूरी है, जिससे बचाव और इलाज किया जा सके।

क्या है कब्ज
जब किसी व्यक्ति का मल बहुत कड़ा हो जाता है और मल त्यागने में मुश्किल होती है तो उसे कब्ज कहते हैं।कब्ज के कारण पाचन तंत्र खराब होने लगता है, और मल शरीर से बहुत कम निकलने लगता है। मल निकलने में शरीर पर जोर भी बहुत लगाना पड़ता है।
जिसकी वजह से पेट में दर्द और गुदा के आसपास परिशानी होने लगती है।

एक स्वस्थ इंसान को एक सप्ताह में 12 बार मल त्याग करना चाहिए। कब्ज का इलाज अगर सही समय पर नहीं किया जाए तो शरीर में अन्य बीमारियां भी आने लगती है।

कब्ज के लक्षण क्या हैं?

अगर किसी व्यक्ति को नीचे दिए हुए लक्षण नज़र आते हैं तो ये कब्ज के लक्षण है और उसे तुरंत अपना इलाज शुरू कराना चाहिए-

• मल कम होना:
कब्ज का प्रमुख लक्षण है मल का काफी कम होना।
ऐसे व्यक्ति को 1 हफ्तों में 3 बार ही मल त्याग होता है 

• मल त्यागने में ज़ोर लगना:
जब किसी व्यक्ति को मल त्याग करते समय ज़ोर लगाना पड़े, तो यह कब्ज का संकेत हो सकता है।

• मलाशय में रूकावट महसूस होना:
कई बार लोगों को लगता है की उन्हें मल आने वाला है, लेकिन बाथरूम जाने में ऐसा होता नहीं है।  मलाशय में रूकावय महसूस होती है। ऐसी स्थिति में भी ये कब्ज का लक्षण हो सकता है।

• मलाशय का पूरी तरह खाली न होना:
यदि किसी व्यक्ति को मल त्यागने के बाद भी ऐसा महसूस हो कि उसका मलाशय पूरी तरह से खाली नहीं हुआ है, तो यह कब्ज का संकेत हो सकता है।

• मल का सख्त होना:
यही किसी व्यक्ति को सख्त मल को सख्त मल की शिकायत है तो ये कब्ज का ही लक्षण है।

कब्ज किन कारणों से होता है?

कब्ज की समस्या किसी भी उम्र के लोगों को हो सकती है, जिसके पीछे बहुत सारे कारण होते हैं। जिनमे से कुछ कारण नीचे दिए हुए हैं-

• खान-पान में बदलाव करना:  
अगर बार खान पान को बदला जाए तो इससे कब्ज की शिकायत होने लगती है।

• पर्याप्त मात्रा में पानी न पीना: 
पानी हमारे शरीर के लिए बहुत ही जरूरत होता है।
यह हमारे शरीर को डिहाइड्रेशन से बचाने के साथ-साथ एनर्जी भी देता है, लेकिन पानी कम पीते है तो इससे कब्ज की शिकायत होने लगती है।

• डेयरी उत्पादों का सेवन ज्यादा करना:
जो लोग डेयरी उत्पादों का सेवन ज्यादा करते हैं। उन लोगों में कब्ज की शिकायत ज्यादा होती है।

• शारीरिक गतिविधियाँ कम करना: 
अगर कोई व्यक्ति शारीरिक गतिविधियाँ ज्यादा नहीं करता है, तो उसे कब्ज होने की संभावना काफी अधिक रहती है।

• मल त्याग ना करना:
अगर 24 घंटे तक कोई व्यक्ति मल त्याग नहीं करता है तो उसे कब्ज की शिकायत हो सकती है।

• फाइबर युक्त भोजन करना:
फाइबर युक्त भोजन खाने को पचाने में मदद करता है, इसलिए अगर खाने में फाइबर की मात्रा ना हो तो कब्ज की समस्या शुरू होने लगती है।

• यूरीन को ज्यादा समय तक रोके रखना:
कई बार हम काम में इतना बिजी हो जाते है की यूरीन रोकते है। लेकिन ऐसा करना ठीक नहीं है। इससे भी कब्ज की शिकायत होने लगती है।

• पर्याप्त नींद न सोना:
एक व्यक्ति को 24 घंटे में कम से कम 7 घंटे की नींद जरूर लेनी चाहिए। लेकिन अगर नींद अच्छे से न ली जा सके तो पाचन तंत्र ठीक से काम नही करता है। और कब्ज की शिकायत हो सकती है।

कब्ज की पहचान कैसे करें?

कब्ज की पहचान 5 तरीके से की जा सकती है जो निम्न प्रकार से हैं-

• मेडिकल हिस्ट्री की जांच करके:
कब्ज की पहचान करने का सबसे आसान तरीका है मेडिकल हिस्ट्री की जांच करना। इसमें व्यक्ति के पहले की पेट की समस्याओं का पता लगाया जाता है।

• ब्लड टेस्ट करके: 
ब्लड टेस्ट के द्वारा भी कब्ज की पहचान की जाती है। इसमें डॉक्टर शरीर के अंदरूनी हिस्से की गतिविधि को मॉनिटर करते हैं।

• यूरिन टेस्ट करके:
कब्ज का पता लगाने के लिए यूरिन टेस्ट भी किया जाता है। 

• स्टूल टेस्ट करके: 
कब्ज का संबंध पेट से हैं, इसलिए स्टूल टेस्ट के द्वारा कब्ज का पता लगाया जाता है।

• एक्स-रे करना:
कई बार, डॉक्टर कब्ज का पता लगाने के लिए एक्स-रे का भी सहारा लेते हैं। इसमें पेट का एक्स-रे करके डॉक्टर पेट के अंदरूनी स्थिति को मॉनिटर करते हैं।

कब्ज के क्या जोखिम हो सकते हैं?

अगर कोई व्यक्ति कब्ज से पीड़ित है, तो उसे निम्न जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है-

• गुदे की नस में सूजन होना:
कब्ज के कारण गुदे (anus) की नस में सूजन आ सकती है। जिसकी वजह से गुदे में दर्द महसूस हो सकता है।

• गुदे की त्वचा का छिलना:
कब्ज की वजह से गुदे की त्वचा छिल जाती है। इसलिए ऐसी स्थिति में मेडिकल सहायता लेना जरूरी होता है।

• बवासीर होना:
यदि इस पेट की समस्या का इलाज लंबे समय तक न किया जाए तो इससे बवासीर भी बन सकता है।

• मूत्र संबंधी समस्याएं होना:
कब्ज के कारण यूरिन ट्रेक इंफेशन भी हो सकता है।

कब्ज की रोकथाम कैसे कर सकते है? 

अगर कोई व्यक्ति निम्नलिखित बातों का पालन करता है, तो वह कब्ज की रोकथाम आसानी से कर सकता है-

• हेल्थी डाइट अपनाना:
कब्ज का एक महत्वपूर्ण कारण अनहेल्थी फूड है।
इसलिए कब्ज की रोकथाम के लिए खानपान में हेल्थी डाइट को फॉलो करना चाहिए। 

• एक्सराइज़ करना:
अगर कोई व्यक्ति हर रोज़ एक्सराइज़ करता है, तो उसको बीमारी की संभावना काफी कम रहती है।
इसलिए लोगों को हर रोज़ कम-से-कम 30 मिनट तक एक्सराइज़ करनी चाहिए ताकि उन्हें किसी तरह की बीमारी न हो।

• अधिक मात्रा में पानी पीना:
जो लोग काफी कम पानी पीते हैं उन लोगों में कब्ज होने की आशंका काफी ज्यादा होती है। इसलिए कब्ज की रोकथाम के लिए रोज़ 6-8 गिलास पानी पीना चाहिए।

• स्ट्रेस से दूर रहना:
जो लोग स्ट्रेस ज्यादा लेते है उन लोगो में कब्ज की शिकायत ज्यादा होती है, इसलिए स्ट्रेस लेवल को मेंटेन रखना जरूरी है।

• टॉयलेट को ज्यादा देर के लिए न रोकना: 
अगर कोई व्यक्ति टॉयलेट को ज्यादा देर के लिए रोकता है, तो उसे कब्ज के साथ साथ और बीमारियाँ होने की संभावना रहती है।

• सुबह गर्म पानी पीना:
कब्ज की समस्या को रोकने के लिए सुबह गर्म पानी पीना चाहिए। ऐसा करने से मल त्याग करने में भी आसानी होती है।

कब्ज का इलाज कैसे किया जा सकता है? 

जैसे ही किसी व्यक्ति को कब्ज का पता चलता है, वैसे ही कब्ज का इलाज निम्नलिखित तरीके से किया जा सकता है-

• घरेलू नुस्खे अपनाना:
कब्ज का सबसे अच्छा इलाज घरेलू नुस्खे में है। इसके लिए नींबू पानी पीना, सादा भोजन करना चाहिए।

• दवाई लेना:
कब्ज का इलाज दवाई के द्वारा भी संभव होता है। यह दवाइयां कब्ज को बढ़ने और राहत प्रदान करने का काम करती हैं।

• सप्लीमेंट का सेवन करना:
सप्लीमेंट लेकर भी कब्ज को ठीक किया जाता है। और इन सप्लीमेंट्स का सेवन डॉक्टर की सलाह से ही ही करना चाहिए।

• बायोफिडबेक थेरेपी करना:
कब्ज के इलाज के लिए बायोफिडबेक थेरेपी का भी इस्तेमाल किया जाता है। इसमें कब्ज के साथ पेट की समस्याओं को ठीक करने को कोशिश की जाती है।

• सर्जरी कराना:
जब कब्ज का इलाज किसी भी तरीके से नहीं हो पाता है, तब डॉक्टर सर्जरी का सहारा लेते हैं। इसमें कोलोन (colon) को निकाल दिया जाता है, ताकि मल त्याग सही तरीके से हो सके।

कब्ज का घरेलू इलाज के लिए उपाय-

आप कब्ज के लिए निम्न घरेलू उपचार आजमा सकते हैंः-

1.  सुबह उठकर नींबू पानी में काला नमक मिलाकर पीना चाहिए, इससे पेट अच्छी तरह साफ होता है और कब्ज की समस्या नहीं होती।

2.  अगर आप रोज सुबह खाली पेट 4 से 5 काजू, और मुनक्के खाते हैं, तो कब्ज की समस्या दूर होगी। इसके अलावा रात को सोने से पहले 6 से 7 मुनक्का खाने से भी कब्ज की शिकायत दूर होती है।

3.  रोज हरड़ का चूर्ण या त्रिफला को गुनगुने पानी के साथ पीने से कब्ज की समस्या दूर होती है। इसके अलावा पेट में बनने वाली गैस की समस्या से भी निजात मिलता है।

4.  रात मे सोने से पहले एक चम्मच शहद को एक गिलास पानी के साथ मिलाकर पिएं। इसका नियमित सेवन करने से कब्ज की समस्या दूर हो जाएगी।

5.  सोते समय अरंडी का तेल हल्के गर्म दूध में मिलाकर भी पीने से कब्ज की समस्या दूर हो जाती है और  पेट भी अच्छे से साफ होता है।

6.  ईसबगोल की भूसी कब्ज के लिए रामबाण इलाज है। इसका प्रयोग दूध या पानी के साथ, रात को सोते वक्त करना चाहिए।

7.   अमरूद और पपीता कब्ज की समस्या के लिए बहुत ही फायदेमंद होते हैं। इनको कभी भी खाया जा सकता है जिससे पेट की समस्याएं दूर होती हैं और त्वचा भी खूबसूरत बनती है।

8.  किशमिश को कुछ देर पानी में भिगो के खाने से कब्ज की शिकायत दूर हो जाती है। इसके अलावा 

9. अंजीर को भी रातभर पानी में भिगाकर रखें और सुबह इसका सेवन करने से कब्ज की शिकायत दूर  होती है।

10.  पालक कब्ज के लिए फायदेमंद होता है। रोज पालक का रस पीने से कब्ज की बीमारी दूर होती है।

11.  कब्ज से बचने के लिए नियमित रूप से व्यायाम और योगा करना बहुत जरूरी है। 

सबसे अधिक पूछे जाने वाले सवाल?

Q1. कब्ज को जल्दी कैसे किया जा सकता है?
Ans- कब्ज को  ठीक करने के लिए खूब पानी पीना, पौष्टिक भोजन करना, एक्सराइज़ करना, इत्यादि को अपनाया जाना चाहिए।

Q2. कब्ज किस चीज़ का संकेत होता है?
Ans- कब्ज पेट की बीमारी का संकेत होता है।
यह समस्या जेनेटिक कारण, सही भोजन न करने इत्यादि से हो सकता है। 

Q3. कब्ज का प्रमुख कारण क्या हैं?
Ans- कब्ज की बीमारी कई कारणों से हो सकती है जैसे पर्याप्त मात्रा में पानी न पीना, किसी अन्य बीमारी से पीड़ित होना, एक्सराइज़ न करना इत्यादि।

Q4. क्या कब्ज जानलेवा हो सकता है?
Ans- कब्ज में ज्यादा दिक्कत नहीं होती है, लेकिन  लंबे समय तक इसका इलाज न करवाया जाए, तब यह घातक  हो सकता है।

Q5. कब्ज होने पर किस तरह का भोजन करना चाहिए?
Ans- कब्ज होने पर लोगों को अपने भोजन में फाइबर वाली चीज़े जैसे सेब, कीवी, कठे फल इत्यादि का सेवन करना चाहिए।

Q6. क्या कब्ज कैंसर का संकेत होता है?
Ans- नहीं, कब्ज कैंसर का संकेत नहीं होता है।

Q7. क्या तनाव से कब्ज हो सकता है?
Ans- हां बिल्कुल, तनाव से कब्ज की समस्या हो सकती है।

Mathura Vrindavan

डिप्रेशन क्या होता है? डिप्रेशन के कारण क्या हैं? डिप्रेशन के लक्षण क्या हैं? डिप्रेशन का उपचार कैसे कर सकते हैं?

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में हमने कभी न कभी स्वयं को उदास और हताश महसूस किया होगा। असफलता, संघर्ष और किसी अपने से बिछड़ जाने के कारण दुखी ह...