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Guru Purnima kab hai मुड़िया पूर्णिमा गोवर्धन मथुरा

2021 में गुरु पूर्णिमा कब है?

गुरु पूर्णिमा : 24 जुलाई, 2021 शनिवार

2021 में गुरु पूर्णिमा 24 जुलाई को पड़ रही है। आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म भी हुआ था, अतः इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं. इस दिन से ऋतु परिवर्तन भी होता है

इस दिन गुरु की पूजा की जाती है। यह पर्व पूरे भारत में बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

मथुरा में गुरु पूर्णिमा को ही मुड़िया पूर्णिमा के रूप में मानते हैं



गोवर्धन का विश्व प्रसिद्ध मुड़िया पूर्णिया मेला निरस्त कर दिया गया है। कोरोना संक्रमण के चलते जिलाधिकारी नवनीत सिंह ने आदेश जारी कर दिए।

इस समय प्रदेश सरकार की कोरोना गाइड लाइन के हिसाब से ही बाजार व अन्य जगह खोली गई हैं, जिनमें एक स्थान पर 50 लोगों से अधिक लोग एकत्र नहीं हो सकते। ऐसे में लाखों लोगों से गाइड लाइन का पालन करना संभव नहीं है। इसलिए मुड़िया पूर्णिमा मेला को लोक स्वास्थ्य व जनहित में निरस्त किया है।

गुरु का अर्थ


'गुरु' शब्द में 'गु' का अर्थ है 'अंधकार' और 'रु' का अर्थ है 'प्रकाश' अर्थात् गुरु का अर्थ हुआ 'अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला मार्गदर्शक'। सही अर्थों में गुरु वही है जो अपने शिष्यों का मार्गदर्शन करे और जो उचित हो उस ओर शिष्य को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे।




Guru Purnima

गुरु पूजन विधि
गुरु पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल स्नान पूजा आदि नित्यकर्मों को करके उत्तम और शुद्ध वस्त्र धारण करें।
अपने गुरु के पास जाएँ उन्हें दंडवत प्रणाम करें। आदर पूर्वक पुष्पमाला पहनाएं।
इसके बाद वस्त्र, फल, फूल व माला, दक्षिणा यथा सामर्थ्य धन के रूप में भेंट करें। इसके बाद उनका आशीर्वाद लेना चाहिए।

गुरु पूर्णिमा का महत्त्व

कबीर ने गुरु की महिमा का गुणगान करते हुए लिखा है

गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय।
बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय।

भारत में पूर्व से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक सभी जगह गुरुमय हो जाती है
गुरु व्यक्ति नहीं अपितु एक अवस्था का नाम है ऐसी अवस्था जब कोई रहस्य जानने को शेष नहीं रहता। किंतु फिर भी करुणावश वह इस जगत में है। जो गुरु ने जाना है उसे बांटने के लिए है।

जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश को सीधे देखना आंखों के लिए हानिकारक है, उसके लिए एक माध्यम होना आवश्यक है। ठीक उसी प्रकार ईश्वर का साक्षात्कार भी जीव सीधे करने में सक्षम नहीं उसके लिए भी गुरु रूपी माध्यम आवश्यक है।


क्योंकि ध्यान-समाधि में जब वह घटना घटेगी और परमात्मा प्रकट होगा तो उस घटना को समझाएगा कौन! क्योंकि जीव इस प्रकार के साक्षात्कार का अभ्यस्त नहीं वह बहुत भयभीत हो जाएगा जैसे अर्जुन भयभीत हुआ था भगवान कृष्ण का रूप देखकर, इसलिए ऐसी स्थिति में गुरु का समीप होना आवश्यक है।

गुरु के माध्यम से ही परमात्मा की थोड़ी-थोड़ी झलक मिलनी शुरू होती है। परमात्मा के आने की खबर का नाम ही गुरु है। जब गुरु जीवन में आ जाए तो समझिए कि अब देर-सवेर परमात्मा आने ही वाला है।


हमारी सामाजिक परम्परा में एक शब्द है 'गुरु बनाना' यह बिल्कुल असत्य व भ्रामक बात है। सत्य यही है कि गुरु ही चुनता है शिष्य को, शिष्य होने के लिए।

गुरु व शिष्य दोनों की परिभाषाएं बदल गई

गुरु की ही तरह शिष्य होना भी कोई साधारण बात नहीं है, शिष्य अर्थात् जिज्ञासु हो। वर्तमान समय में गुरु व शिष्य दोनों की परिभाषाएं बदल गई हैं। गुरु भी धन बटोरने में लग गए और शिष्यों को भी ऐसे ही गुरु चाहिये।

आज अधिकांश केवल सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए गुरु-शिष्य परंपरा चल रही है। वर्तमान समय में गुरु यह देखता है कि सामाजिक जीवन में उसके शिष्य का कद कितना बड़ा है और शिष्य यह देखता है कि उसका गुरु कितना प्रतिष्ठित व समाज में उसकी कितनी पहुँच है।

गुरु व शिष्य दोनों ही इस जगत् की बड़ी असाधारण घटनाएं है क्योंकि यह एकमात्र संबंध है जो विशुद्ध प्रेम पर आधारित है और जिसकी अंतिम परिणति परमात्मा है।

अगर आपके गुरु नहीं हैं तो क्या करें?

हर गुरु के पीछे गुरु सत्ता के रूप में शिव जी ही हैं.
अगर गुरु न हों तो शिव जी को ही गुरु मानकर गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाना चाहिए.
श्रीकृष्ण को भी गुरु मान सकते हैं.
श्रीकृष्ण या शिव जी का ध्यान कमल के पुष्प पर बैठे हुए करें.
मानसिक रूप से उनको पुष्प,मिष्ठान्न, तथा दक्षिणा अर्पित करें.
स्वयं को शिष्य के रूप में स्वीकार करने की प्रार्थना करें.

कौन हो सकता है आपका गुरु
सामान्यतः हम लोग शिक्षा प्रदान करने वाले को ही गुरु समझते हैं परन्तु वास्तव में ज्ञान देने वाला शिक्षक बहुत आंशिक अर्थों में गुरु होता है।

जन्म जन्मान्तर के संस्कारों से मुक्त कराके जो ईश्वर तक पहुंचा सकता हो, ऐसी सत्ता ही गुरु हो सकती है।

अब तो लोग ऐसे लोगों को ही गुरु मान रहे हैं जिनका भगवान से कोई लेना देना नहीं है। वो अपनी जेब भरे जा रहे हैं और लोगों को उल्लू बनाये चले जा रहे हैं। और लोग आराम से बन रहे हैं।

लोगों को सोचना चाहिए कि हम जिन लोगों के पास जा रहे हैं उनका भगवान के प्रति कुछ लगाव है भी या नहीं।
मुड़िया पूनों मेले का इतिहास 500 वर्ष पुराना है, इस दिन लोग गोवर्धन में गिरराज जी की परिक्रमा करते हैं।

सार

1. इस दिन केवल गुरु की ही नहीं अपितु परिवार में जो भी बड़ा है अर्थात माता-पिता, भाई-बहन, आदि को भी गुरु तुल्य समझना चाहिए।
2. गुरु की कृपा से ही विद्यार्थी को विद्या आती है। उसका अज्ञान व अन्धकार दूर होता है।
3. गुरु का आशीर्वाद ही प्राणी मात्र के लिए कल्याणकारी, ज्ञानवर्धक और मंगल करने वाला होता है।
4. गुरु से मन्त्र प्राप्त करने के लिए भी यह दिन श्रेष्ठ है।
5. इस दिन गुरुजनों की यथा संभव सेवा करने का बहुत महत्व है।
6. इसलिए इस पर्व को श्रद्धापूर्वक जरूर मनाना चाहिए।
7. संसार की सम्पूर्ण विद्याएं गुरु की कृपा से ही प्राप्त होती है।

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