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ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की अपरा एकादशी व्रत पूजा विधि, व्रत का महत्व

2021 में अपरा एकादशी कब है?
6 जून, 2021
(रविवार)





अपरा एकादशी, दो नाम से जानी जाती है- अजला और अपरा। इस दिन भगवान त्रिविक्रम की पूजा की जाती है और इस एकादशी को करने से पुण्य फल मिलते है। इस व्रत को करने से कीर्ति, पुण्य और धन की वृद्धि होती है। इसके साथ साथ मनुष्य को ब्रह्म हत्या, परनिंदा और प्रेत योनि जैसे पापों से भी मुक्ति मिलती है।

अपरा एकादशी व्रत पूजा विधि

अपरा एकादशी का व्रत नियमपूर्वक करके भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इसको करने से सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है और परलोक की प्राप्ति भी होती है। इस व्रत की पूजा विधि इस प्रकार है:

1. अपरा एकादशी से एक दिन पहले शाम को सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए।

2. एकादशी के दिन सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। पूजा में तुलसी, चंदन, गंगाजल और फल का प्रसाद चढ़ाना चाहिए।

3. इस दिन व्रत में छल-कपट, बुराई और झूठ नहीं बोलना चाहिए। इस दिन चावल खाने भी नही खाना चाहिए।

4. विष्णुसहस्रनाम का पाठ करना चाहिए। जो व्यक्ति विष्णुसहस्रनाम का पाठ करता है उस पर भगवान विष्णु की कृपा होती है।

ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की अपरा एकादशी व्रत का महत्व

एक बार महाराज युधिष्ठर ने श्री कृष्ण से हाथ जोड़कर कहा- आप कृपाकर ज्येष्ठ मास की एकादशी के बारे में बताइए। तब भगवान् श्री कृष्ण ने कहा- ज्येष्ठमास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा कहा जाता है क्योंकि यह अपार पापों को नष्ट करने वाली एकादशी होती है। इस एकादशी व्रत को करने से ब्रह्महत्या, भ्रूणहत्या, गौहत्या, मित्रहत्या, पर-निंदा, पर-स्त्रीरमण , झूठी गवाही देने का पाप आदि सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

स्वर्णदान, अश्वदान, गजदान, भूमिदान, विद्यादान, अन्नदान, कन्यादान जैसे महादानों को करने का जो फल होता है, वही पुण्य-फल इस अपरा एकादशी का व्रत करने से भी होता है।

गंगा तट पर पितरों को पिंडदान, कुंभ में केदारनाथ के दर्शन या बद्रीनाथ के दर्शन, सूर्यग्रहण में स्वर्णदान करने से जो फल मिलता है, वही फल अपरा एकादशी के व्रत से भी मिलता है।

अपरा के जैसा पापों को नष्ट करने वाला कोई भी पुण्य-फल नही है और इस पुण्य-फल को प्राप्त करने के लिए अपरा एकादशी का व्रत रखना बहुत जरूरी है। अपरा को न मानने वाले प्राणियों को कहीं भी शांति नहीं मिलती।

अपरा एकादशी व्रत कथा

प्राचीन काल में महीध्वज नाम के एक धर्मात्मा राजा था। उसका छोटा भाई वज्रध्वज अपने बड़े भाई के प्रति द्वेष की भावना रखता था। इसी के चलते वज्रध्वज ने एक दिन राजा की हत्या कर दी और उसके मृत शरीर को जंगल में पीपल के पेड़ के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु होने की वजह से राजा की आत्मा भूत बनकर पीपल पर रहने लगी। उस मार्ग से जो भी गुजरता था, वो आत्मा उसे परेशान करती थी।

एक दिन, एक ऋषि इस रास्ते से गुजर रहे थे। तब उन्होंने प्रेत को देखा और अपनी शक्ति से उसके प्रेत बनने का कारण पूछा। तब ऋषि ने राजा की प्रेतात्मा को मुक्ति दिलाने के लिए परलोक विद्या का उपदेश सुनाय। स्वयं अपरा एकादशी का व्रत रखा और व्रत पूरा होने पर इसका पुण्य प्रेत को दे दिया। ऐसे व्रत के प्रभाव से राजा की आत्मा प्रेतयोनि से मुक्त हो गई और वह स्वर्ग चला गया।

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